Wednesday, April, 29,2026

आईएएस पुरुषोत्तम शर्मा की ट्रांसपोर्ट कमिश्नर पद पर नियुक्ति को ठहराया गलत... पावर्स भी सीज

जयपुर: राजस्थान हाई कोर्ट के आईएएस पुरुषोत्तम शर्मा की ट्रांसपोर्ट कमिश्नर पोस्ट पर नियुक्ति को गलत ठहराने वाले मंगलवार के फैसले ने चौंका दिया है। ठीक वैसे ही जिस तरह डीओपी ने सितंबर 2025 में रोडवेज के एमडी के साथ ही पुरुषोत्तम शर्मा को ट्रांसपोर्ट कमिश्नर बनाने का ऑर्डर जारी करके समूची ब्यूरोक्रेसी को चौंकाया था। यह महत्वपूर्ण और असाधारण बात है कि डीओपी की किसी गलती को सुधारने के लिए हाई कोर्ट को दखल देना पड़ा हो, राज्य के प्रशासनिक इतिहास में ऐसा पहली बार ही हुआ है।

यह बात भी असाधारण है कि हाई कोर्ट ने डीओपी के ऑर्डर को न केवल गलत ठहराया है, बल्कि पुरुषोत्तम शर्मा की पावर्स को सीज करके उन्हें काम करने से भी रोक दिया है। हाई कोर्ट में याचिका लगाने वाली बस ऑपरेटर्स एसोसिएशन का यह तर्क है कि उनकी तरह ही रोडवेज भी बसें चलाने वाली एक ऑपरेटर ही है। ऐसे में रोडवेज के एमडी ही यदि ट्रांसपोर्ट कमिश्नर भी हैं तो वे तो एसोसिएशन के मुकाबले रोडवेज को ही तरजीह देंगे। यह खुले तौर पर 'क्लैश ऑफ इंट्रेस्ट' है। प्रशासनिक जानकारों का मानना है कि दरअसल, 25 जनवरी का, एक ही व्यक्ति (आईएएस) को दोनों पोस्टों की जिम्मेदारी सौंपने का ऑर्डर बेसिक तौर पर ही गलत था। दोनों पोस्ट पर फुल टाइम जॉब है। पुरुषोत्तम शर्मा जब सितंबर 2024 से रोडवेज के एमडी की कमान संभाले हुए थे, तो फिर सितंबर 2025 में शुचि त्यागी को हटाकर कमिश्नर बनाने का क्या औचित्य था।

गौरतलब है कि वर्तमान में रोडवेज में भी और ट्रांसपोर्ट विभाग में भी काम व जिम्मेदारियां काफी बढ़ी हुई हैं। रोडवेज में जहां नई बसें खरीदी जा रही हैं और संस्थान को घाटे से उबारने के प्रयास किए जा रहे हैं, वहीं ट्रांसपोर्ट विभाग भी नए वित्तीय वर्ष में 11 हजार करोड़ रुपए का राजस्व जुटाने के नए टारगेट को पूरा करने में जुटा है। यह सही है कि पुरुषोत्तम शर्मा दोनों ही फ्रंट पर अपनी क्षमता के साथ काम कर रहे हैं, लेकिन एक तो वे दोनों ही पोस्ट पर काबिज अब तक के सबसे जूनियर आईएएस हैं, ऐसे में उन्हें पर्याप्त अनुभव नहीं है। फिर दो-दो पोस्ट की जिम्मेदारी संभालने की उनकी भी सीमा है। उन पर इतना बोझ लादना व्यावहारिक भी नहीं है।

अब डीओपी को इस मामले में तुरंत व प्रेक्टिकल फैसला लेना होगा। ज्यादा अच्छा तो प्रशासनिक जानकारों के अनुसार, यह है कि दोनों पोस्ट पर सीनियर आईएएस को ही लगाया जाए। 11 हजार करोड़ का लक्ष्य हासिल करने के लिए ट्रांसपोर्ट कमिश्नर भी उसी कैपेसिटी का होना चाहिए। इधर, अगर ट्रांसपोर्ट सचिव को ही रोडवेज का चेयरमैन भी रखना है तो फिर एमडी पद पर भी अनुभवी आईएएस की जरूरत है। जानकारों का मानना है कि रोडवेज संस्थान के लिए ज्यादा सही व व्यावहारिक फैसला तो कमान एक ही सीएमडी को सौंपने वाला होगा।

हाई कोर्ट के फैसले से बढ़ी बहस

ट्रांसपोर्ट कमिश्नर के मामले में हाई कोर्ट के फैसले की जद में अन्य कई दूसरे विभाग भी आ सकते हैं। वित्त विभाग में सचिव और सीसीटी की पोस्ट एक ही अफसर के पास है। सहकारिता सचिव व रजिस्ट्रार भी एक ही है। एलएसजी में सचिव व डायरेक्टर एक ही है। ये केवल उदाहरण हैं। ऐसे ही मामले और भी हैं। जानकारों का कहना है कि जहां भी नीचे के फैसलों या आदेशों की अपील ऊपर की जानी होती है, वहां दोनों पोस्ट पर एक ही अथॉरिटी का होना सही माना जा सकता है। ये मामले 'क्लैश ऑफ इंट्रेस्ट' के नहीं हैं। लेकिन अपीलों की सुनवाई के न्याय संगत होने के हैं।

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