Wednesday, June, 24,2026

टाइगर पुनर्स्थापना बनी दुनिया के लिए मिसाल

अलवर: वर्ष 2008 में जब सरिस्का टाइगर रिजर्व में रणथंभौर से पहली बार बाघों का पुनर्स्थापन (रिलोकेशन) किया गया था, तब शायद ही किसी ने सोचा होगा कि यह परियोजना देश के सबसे सफल वन्यजीव संरक्षण अभियानों में गिनी जाएगी। 18 साल बाद सरिस्का न केवल बाघों की वापसी का प्रतीक बन चुका है, बल्कि यहां अब तीसरी और चौथी पीढ़ी के बाघ भी जंगल में विचरण कर रहे हैं। एनटीसीए ने तय किया है कि अब 18 वर्षों की सफलता की खुशियां मनाई जाएंगी। आगामी 28 जून को देशभर से लोग यहां जुटेंगे और यह जश्न अगले दो साल तक चलेगा।

सरिस्का में वर्ष 2004-05 के दौरान बाघों का पूरी तरह सफाया हो गया था। 2005 में वह काला दिन था, जब सरिस्का टाइगर रिजर्व को टाइगर-विहीन घोषित किया गया। वन्यजीव प्रेमियों में चिंता थी तो गुस्सा भी था। सरकारी स्तर से लेकर रिजर्व में रह रहे ग्रामीणों तक ने सरिस्का को वापस आबाद कराने का प्लान शुरू किया। हालांकि सबसे पहले टाइगर को सरिस्का में जहर देकर मार दिया गया था, लेकिन उसके बावजूद कोशिशें नहीं रुकीं। पहली बार 28 जून 2008 को रणथंभौर से नर बाघ ST-1 और मादा बाघिन ST-2 को सरिस्का लाया गया। पहले बाघ को एयरलिफ्ट किया गया था, जो दुनिया में पहली बार हुआ था। कई दिनों तक सरिस्का एनक्लोजर में मॉनिटरिंग की गई और फिर खुला छोड़ दिया गया। यहीं से बाघ पुनस्र्थापना परियोजना की शुरुआत हुई।

सरिस्का में शुरुआती वर्षों में ST 1, ST-2, ST-3, ST-4, ST-5, ST-6, ST-9, ST-10, ST-16, ST-29 और ST-30 बाघ-बाघिनों को बाहर से लाकर बसाया गया। इन पुनस्र्थापित बाघों ने यहां नई पीढ़ी को जन्म दिया और बाधों की संख्या लगातार बढ़ती गई। ST-2 सरिस्का की सबसे महत्वपूर्ण बाधिन साबित हुई। उसे राजमाता का दर्जा मिला और पिछले 28 जून को शावकों के साथ राजमाता बाधिन की प्रतिमा भी लगाई गई। उसने यहां पहली बार शावकों को जन्म देकर परियोजना को नई दिशा दी।

उसके वंश से ST-7, ST-8, ST-14 बाघिन और ST-13 जैसा बाघ पैदा हुआ। आगे चलकर ST-14 ने नई पीढ़ी को जन्म दिया, जिससे सरिस्का में बाघों का कुनबा तेजी से बढ़ा। भाजपा की वर्तमान सरकार और मंत्री मानते हैं कि सरिस्का में बाघों का खात्मा कांग्रेस सरकार के दौरान हुआ था और शिकारियों ने अनदेखी के कारण बाघों का शिकार किया तथा उन्हें अंतरराष्ट्रीय बाजार में बेच दिया। वर्तमान परिवार वृक्ष बताता है कि सरिस्का में अब कई पीढ़ियां विकसित हो चुकी हैं। ST-11, ST-12, ST-15, ST-17, ST-18, ST-19, ST-22, ST-23, ST 24, ST-25, ST-26, ST-27 और ST-28 जैसे बाघ सरिस्का में जन्मे और पले-बढ़े हैं। इनके जरिए बाघों की तीसरी और चौथी पीढ़ी भी सामने आ चुकी है। वर्ष 2022 से 2024 के बीच कई बाधिनों ने शावकों को जन्म दिया। परिवार वृक्ष के अनुसार अलग-अलग बाधिनों से 2, 3 और 4 शावकों के समूह सामने आए हैं, जो इस बात का संकेत हैं कि सरिस्का का आवास बाघों के प्रजनन के लिए अनुकूल बना हुआ है।

हालांकि इस दौरान कई बाघों की मृत्यु भी हुई। ST-1, ST-2, ST-3, ST-4, ST-5, ST-6, ST-11, ST-13 और ST-16 जैसे बाघ अब जीवित नहीं हैं, लेकिन इसके बावजूद बाघों की आबादी का विस्तार जारी रहा। वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार सरिस्का का यह मॉडल देश में पहला ऐसा प्रयोग था, जिसमें एक खाली हो चुके टाइगर रिजर्व में दूसरे क्षेत्र से बाघों को लाकर सफलतापूर्वक नई आबादी विकसित की गई। 18 वर्षों में सरिस्का ने साबित किया है कि यदि संरक्षण, निगरानी और स्थानीय सहयोग मिले तो विलुप्ति की कगार पर पहुंची प्रजातियों को भी दोबारा बसाया जा सकता है। आज सरिस्का केवल एक टाइगर रिजर्व नहीं, बल्कि भारत में वन्यजीव संरक्षण की सबसे बड़ी सफलता की मिसाल बन चुका है। 2008 में शुरू हुई यह यात्रा अब चौथी पीढ़ी तक पहुंच चुकी है और सरिस्का के जंगलों में बाघों की दहाड़ फिर से स्थायी रूप से गूंज रही है।

सरिस्का में कुल 56 बाघ हो चुके हैं और उम्मीद है कि यह कुनबा यूं ही बढ़ता रहेगा। आने वाले समय में सरिस्का से भी बाघों को दूसरी जगह शिफ्ट किया जा सकता है, ताकि दूसरे टाइगर रिजर्व को आबाद किया जा सके। 28 जून से एनटीसीए द्वारा केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव के निर्देश पर सफलता के 18 वर्ष मनाने का फैसला किया गया है, जो सरिस्का के प्रत्येक कर्मचारी के योगदान, सरकार की कोशिशों और वन्यजीव प्रेमियों के प्रयासों के प्रति आभार होगा। साथ ही दुनिया को यह भी बताया जाएगा कि कैसे अलग-अलग तरह के जानवरों का विस्थापन सफलतापूर्वक किया जा सकता है। सरिस्का दुनिया में अपनी तरह का अलग उदाहरण है। देशभर के अधिकारी 28 जून को सरिस्का में जुटेंगे।

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