Thursday, September, 24,2026

जब पर्व नहीं, आत्मशुद्धि का महापर्व बन जाता है पर्युषण... 'अंतरमन की ओर' में उठे धर्म-विज्ञान, क्षमा से जुड़े सवाल

जयपुर: धर्म केवल परंपराओं का पालन है या स्वयं को भीतर से बदलने की यात्रा? 'जियो और जीने दो' केवल एक विचार है या जीवन जीने की दृष्टि? अहिंसा, अपरिग्रह, संयम, त्याग और क्षमा जैसे सिद्धांत आज की तेज रफ्तार जिंदगी में कितने प्रासंगिक हैं? और आखिर पर्युषण को केवल एक पर्व नहीं, बल्कि महापर्व क्यों कहा जाता है? इन्हीं गहरे सवालों के जवाब तलाशता है सच बेधड़क न्यूज चैनल का विशेष कार्यक्रम 'अंतरमन की ओर पर्युषण पर्व से क्षमावाणी पर्व तक'।

श्री दिगंबर जैन मंदिर, जनकपुरी प्रथम, ज्योतिनगर में आचार्य श्री 108 आदित्य सागर जी मुनिराज के सानिध्य में हुए इस विशेष संवाद की प्रस्तुति सच बेधड़क की प्रोग्रामिंग एग्जीक्यूटिव वर्तिका जैन ने की। संवाद में पर्युषण पर्व, अनंत चतुर्दशी और विशेष रूप से क्षमावाणी पर्व एवं 'मिच्छामि दुक्कड़म्' के भाव को केंद्र में रखते हुए धर्म के बाहरी स्वरूप से आगे बढ़कर उसके अंतरंग पक्ष को समझने का प्रयास किया गया।

क्यों महापर्व है पर्युषण ?

कार्यक्रम में यह सवाल प्रमुखता से सामने आया कि पर्युषण को केवल कैलेंडर पर आने वाले धार्मिक दिनों के रूप में देखने के बजाय इसे आत्ममंथन और आत्मशुद्धि का महापर्व क्यों माना जाता है। संवाद में संयम, तप, त्याग, आत्मचिंतन और अपने भीतर झांकने की आवश्यकता पर विस्तार से चर्चा हुई। आज जब मनुष्य बाहरी उपलब्धियों की दौड़ में लगातार आगे बढ़ रहा है, ऐसे में क्या कुछ समय अपने भीतर देखने के लिए भी होना चाहिए- इसी सवाल के साथ कार्यक्रम ने आधुनिक जीवन में इन पर्वो की प्रासंगिकता को सामने रखा।

'मिच्छामि दुक्कड़म्' - एक शब्द या भीतर की यात्रा ?

कार्यक्रम का सबसे महत्वपूर्ण केंद्र रहा क्षमावाणी पर्व। 'मिच्छामि दुक्कड़म्' के पीछे छिपे भाव को समझते हुए यह चर्चा की गई कि क्षमा केवल एक-दूसरे से औपचारिक रूप से क्षमा मांग लेने का नाम नहीं, बल्कि अपने भीतर के क्रोध, अहंकार, द्वेष और कटुता को पहचानने तथा उन्हें छोड़ने की दिशा में एक कदम है। क्षमा मांगना जितना महत्वपूर्ण है, उतना ही महत्वपूर्ण है मन से क्षमा कर पाना इसी भाव को संवाद में विशेष स्थान मिला।

गोला मिश्री की परंपरा पर भी हुई विशेष चर्चा

क्षमावाणी पर्व से जुड़ी परंपराओं में गोला मिश्री की उपस्थिति भी संवाद का एक विशेष विषय रही। वर्षों से चली आ रही परंपरा में इस दिन अन्य वस्तुओं के साथ गोला मिश्री रखने की परंपरा को लेकर यह जानने की कोशिश की गई कि आखिर गोला मिश्री का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व क्या है और इस परंपरा के पीछे कौन-सा भाव निहित है। यह बातचीत केवल परंपरा को दोहराने तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह समझने का प्रयास किया गया कि समय के साथ चली आ रही धार्मिक परंपराओं के पीछे उनके भाव, प्रतीक और सामाजिक-सांस्कृतिक अर्थों को किस तरह समझा जाए।

जैन धर्म और विज्ञान -आखिर यह संबंध क्यों?

'अंतरमन की ओर' में एक महत्वपूर्ण सवाल यह भी रहा कि जैन दर्शन को अक्सर वैज्ञानिक दृष्टिकोण से जोड़कर क्यों देखा जाता है? संवाद में इस बात पर चर्चा हुई कि जैन दर्शन में प्रकृति, जीव, कर्म, आत्मा, संयम, आहार, जीवनशैली और आत्म-अनुशासन को लेकर अनेक गहरी अवधारणाएं मिलती हैं। इन्हें आधुनिक दृष्टि से समझने पर कई विषय ऐसे सामने आते हैं, जिन पर आज भी विचार और अध्ययन किया जाता है। कार्यक्रम का उद्देश्य धार्मिक मान्यताओं को वैज्ञानिक प्रमाण के रूप में प्रस्तुत करना नहीं, बल्कि यह सवाल उठाना रहा कि सदियों पहले विकसित हुए इन दार्शनिक विचारों को आज के वैज्ञानिक और तार्किक दृष्टिकोण से किस प्रकार समझा जा सकता है। यही कारण रहा कि संवाद में पर्वो को केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि मनुष्य के जीवन, व्यवहार, अनुशासन और आत्मचिंतन से जुड़े अवसर के रूप में देखने की दृष्टि भी सामने आई।

धर्म बाहर से अधिक भीतर का विषय

आचार्य श्री 108 आदित्य सागर जी मुनिराज के साथ हुए इस विशेष संवाद में 'जियो और जीने दो', अहिंसा, अपरिग्रह, संयम, त्याग, करुणा, क्षमा और आत्मशुद्धि जैसे विषयों को वर्तमान जीवन से जोड़कर देखा गया। सवाल यह भी रहा कि क्या धर्म केवल मंदिर जाने, पूजा करने और परंपराओं का पालन करने तक सीमित है, या धर्म का वास्तविक प्रभाव हमारे व्यवहार, विचार और जीवन जीने के तरीके में दिखाई देना चाहिए? 'अंतरमन की ओर' इसी प्रश्न के साथ दर्शक को अपने भीतर झांकने के लिए प्रेरित करता है। पर्युषण से अनंत चतुर्दशी और फिर क्षमावाणी तक की यह यात्रा अंततः एक ही भाव पर आकर ठहरती है स्वयं को जानना, अपनी भूलों को स्वीकार करना, दूसरों को क्षमा करना और मन को अधिक निर्मल बनाना। सच बेधड़क न्यूज चैनल का यह विशेष कार्यक्रम 'अंतरमन की ओर : पर्युषण पर्व से क्षमावाणी पर्व तक' केवल एक धार्मिक संवाद नहीं, बल्कि आज के समय में थर्म की प्रासंगिकता, परंपराओं के पीछे छिपे भाव और आत्मशुद्धि की आवश्यकता पर केंद्रित एक गंभीर आध्यात्मिक पहल के रूप में सामने आया।

 

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