Monday, March, 16,2026

आदेश के बावजूद केस लिस्ट नहीं होना न्याय में बाधा: कोर्ट

जोधपुर: राजस्थान हाई कोर्ट की जोधपुर मुख्यपीठ ने अदालती आदेश के बावजूद मुकदमों को कॉज लिस्ट में शामिल नहीं करने को 'न्याय के प्रशासन में हस्तक्षेप' करार दिया है। जस्टिस डॉ. पुष्पेंद्र सिंह भाटी और जस्टिस संदीप शाह की खंडपीठ ने सुओ मोटो अवमानना याचिका पर सुनवाई करते हुए रजिस्ट्री अधिकारियों को भविष्य में सतर्क रहने के निर्देश दिए। हालांकि अधिकारियों के स्पष्टीकरण और बिना शर्त माफी स्वीकार करते हुए कॉज लिस्ट अधीक्षक व न्यायिक प्रशासनिक अधिकारी के खिलाफ कार्यवाही समाप्त कर दी गई। मामला 12 जमानत अर्जियों को सूचीबद्ध न करने से जुड़ा था। 20 फरवरी 2024 को एकल पीठ ने इन्हें 22 फरवरी की कॉज लिस्ट में शामिल करने का निर्देश दिया था, लेकिन तय तिथि पर सुबह 10:30 बजे तक मामले सूची में नहीं थे। अधिवक्ताओं नेवीएस देवड़ा और डॉ. एपी सिंह ने इसे गंभीर लापरवाही बताया। खंडपीठ ने कहा कि ऐसी त्रुटियां न्याय प्रक्रिया को प्रभावित करती हैं।

इन मामलों को नहीं मिल पाई थी कार्यसूची में जगह

कोर्ट के आदेश के बावजूद जिन महत्वपूर्ण मामलों को समय पर कार्यसूची में जगह नहीं मिल पाई, उनमें मुख्य रूप से आपराधिक जमानत याचिकाएं शामिल थीं। इनमें भूपेंद्र बनाम राजस्थान राज्य, महेश बनाम राजस्थान राज्य, ललित बनाम राजस्थान राज्य और विशना राम बनाम राजस्थान राज्य जैसी अहम अर्जियां शामिल थीं। इसके अलावा कालू राम, वरिंगाराम, रतनलाल, रवि कुमार, ललित कुमार, राधाराम उर्फ राधाकिशन, बीरमाराम उर्फ ब्रहाराम और बजरंग सिंह की जमानत अर्जियां भी उसी दिन सुनवाई के लिए नियत की गई थीं। इन सभी मामलों को सूची से बाहर रखा गया था।

कोर्ट मास्टर से जवाब तलब

एकल पीठ ने मामले की जड़ तक जाने के लिए कोर्ट मास्टर से जवाब तलब किया। कोर्ट मास्टर ने बताया कि 20 फरवरी को आदेशित सभी 12 फाइलों को 21 फरवरी की सुबह ही संबंधित क्लर्क को भेज दिया गया था। इसके बावजूद लिस्टिंग न होना एक बड़ी प्रशासनिक चूक थी। कोर्ट ने अपने आदेश में लिखा, 'अदालत द्वारा अगली तारीख तय करने के बाद भी फाइलों को लिस्ट न करना न्याय के प्रशासन में हस्तक्षेप के समान है।'

न्याय मित्र ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का दिया संदर्भ

सुओ मोटो अवमानना मामले की विस्तृत सुनवाई के दौरान न्याय मित्र प्रतीक गट्टानी ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय 'मनोज बनाम उत्तर प्रदेश राज्य' का हवाला दिया। उन्होंने दलील दी कि केवल किसी प्रकरण के तय तिथि पर कॉज लिस्ट में शामिल न हो पाने के आधार पर रजिस्ट्री अधिकारियों के विरुद्ध अवमानना कार्यवाही शुरू नहीं की जा सकती। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया है कि कई बार तकनीकी या प्रशासनिक कारणों से, आदेश होने के बावजूद, मामलों की लिस्टिंग संभव नहीं हो पाती। इसे न्यायालय की अवमानना नहीं माना जाना चाहिए। साथ ही, ऐसे मामलों में अवमानना याचिका दायर कर रजिस्ट्री पर अनावश्यक दबाव बनाना उचित नहीं है। जस्टिस डॉ. पुष्पेंद्र सिंह भाटी और जस्टिस संदीप शाह की खंडपीठ ने रिकॉर्ड व स्पष्टीकरण पर विचार कर अधिकारियों की बिना शर्त माफी स्वीकार करते हुए कार्यवाही का निस्तारण कर दिया।

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