Thursday, April, 30,2026

लोकसेवकों के खिलाफ सीधे FIR दर्ज करना न्यायसंगत नहीं

जोधपुर: राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर मुख्यपीठ ने लोक सेवकों को दुर्भावनापूर्ण और बदले की भावना से दर्ज कराए जाने वाले मुकदमों से बचाने के लिए 'भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता' के तहत एक अहम कानूनी व्यवस्था दी। जस्टिस फरजंद अली की एकल पीठ ने श्रीगंगानगर की विशेष अदालत के उस आदेश को पूरी तरह रद्द कर दिया, जिसमें चार पुलिसकर्मियों (एक DSP समेत) के खिलाफ सीधे FIR दर्ज करने के निर्देश दिए गए थे। कोर्ट ने साफ कहा कि नए कानून BNSS की धारा 223 अब हर सरकारी अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई से पहले दो जरूरी शर्तें लागू करती है कि अधिकारी को अपना पक्ष रखने का असली मौका देना और उसके वरिष्ठ अधिकारी से तथ्यात्मक रिपोर्ट लेना। बिना इन दोनों के कोई मजिस्ट्रेट सीधे FIR का आदेश नहीं दे सकता।

क्या था पूरा मामला?

श्रीगंगानगर के अनूपगढ़ पुलिस थाने में 20 अगस्त 2025 को संजय कुमार नाम के व्यक्ति ने टेकचंद और अन्य के खिलाफ BNS की गंभीर धाराओं और SC/ST एक्ट के तहत एफआईआर दर्ज कराई। पुलिस ने इस मामले में जांच पूर्ण होने के बाद चार्जशीट दायर की। 25 सितंबर 2025 को अनूपगढ़ पुलिस थाने में दूसरी FIR पहले मामले के आरोपी टेकचंद ने पलटवार करते हुए दर्ज करवाई। इस एफआईआर में टेकचंद ने संजय कुमार व अन्य पर हत्या के प्रयास सहित कई गंभीर अपराधों में आरोप लगाए। लेकिन पुलिस जांच में यह FIR झूठी और बदले के तहत दर्ज कराना साबित हुई, जिसके आधार पर 25 नवंबर 2025 को नेगेटिव फाइनल रिपोर्ट पेश की गई।

नाराज आरोपी ने कोर्ट में दी शिकायत

पुलिस की नेगेटिव फाइनल रिपोर्ट पर टेकचंद नै 1 नवंबर 2025 को जांच कर रहे पुलिस अधिकारियों के खिलाफ एक निजी शिकायत दायर की। टेकचंद ने पुलिस अधिकारियों पर आरोप लगाया कि जांच में जानबूझकर गड़बड़ी की गई और अधिकारियों ने अपने अधिकारों का दुरुपयोग किया। यह भी आरोप लगाए गए कि पुलिस अधिकारियों ने टेकचंद के साथ मारपीट की। टेकचंद द्वारा ट्रायल कोर्ट में दी गई निजी शिकायत पर एससी/एसटी एक्ट कोर्ट, श्रीगंगानगर ने 21 नवंबर 2025 को फैसला सुनाया। कोर्ट ने याचिकाकर्ता पुलिस अधिकारियों डीएसपी प्रशांत कौशिक, एएसआई मनोहर सिंह, एसआई सरदार सिंह और ड्राइवर किशन सिंह के खिलाफ BNSS की धारा 175(3) के तहत एसपी को FIR दर्ज करने का आदेश दिया। याचिकाकर्ता चारों पुलिस अधिकारियों ने इस आदेश को राजस्थान हाई कोर्ट में चुनौती दी।

याचिकाकर्ता पुलिस अधिकारियों की दलीलें

याचिकाकर्ता पुलिस अधिकारियों की ओर से अधिवक्ताओं ने दलील दी कि 21 नवंबर 2025 का कोर्ट का आदेश कानून के विपरीत है, जो मजिस्ट्रेट ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर पारित किया। अधिवक्ता ने कहा कि मजिस्ट्रेट ने आदेश में कोई ठोस कारण नहीं दिया, जिसके चलते यह "नॉन-स्पीकिंग और मैकेनिकल ऑर्डर" है।

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