Saturday, April, 18,2026

200 साल पुरानी परंपरा ने दिए 'सुकाल' के संकेत

जोधपुर: मारवाड़ की मिट्टी में रची-बसी लोक परंपराओं का अनोखा रंग एक बार फिर देखने को मिला। जोधपुर जिले के तिंवरी क्षेत्र में हाली अमावस्या के अवसर पर करीब 200 साल पुरानी परंपरा के जरिए इस बार के मानसून का अनुमान लगाया गया। कुम्हार के चाक पर तैयार किए गए पांच मिट्टी के घड़ों ने ग्रामीणों की उम्मीदों और आस्था को एक बार फिर जीवंत कर दिया। जैसे ही घड़ों से पानी निकलने की प्रक्रिया शुरू हुई, वहां मौजूद लोग एकटक नजरें जमाए परिणाम का इंतजार करते रहे। इस परंपरा के अनुसार पांच घड़ों का विशेष महत्व होता है। चार हैं, घड़े ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावण और भाद्रपद महीनों का प्रतीक माने जाते जबकि बीच में रखा गया घड़ा आकाश का प्रतिनिधित्व करता है।

कुम्हार चाक घुमाकर इन घड़ों को तैयार करता है और फिर एक निश्चित विधि से उनमें पानी और धान डाला जाता है। इसके बाद घड़ों के फूटने या पानी निकलने के समय के आधार पर बारिश का अनुमान लगाया जाता है। खास बात यह है कि यहां एक मिनट को तीन दिन के बराबर माना जाता है, जिससे पूरे मानसून की अवधि का आकलन किया जाता है। इस बार ज्येष्ठ का घड़ा करीब 9 मिनट में फूटा, जिससे संकेत मिला कि मानसून की शुरुआत कमजोर रह सकती है और शुरुआती दिनों में बारिश कम होने की संभावना है। वहीं आषाढ़ का घड़ा साढ़े चार मिनट में फूटा, जिसके आधार पर जून के अंतिम सप्ताह से जुलाई के पहले सप्ताह तक अच्छी बारिश का अनुमान लगाया गया है। श्रावण और भाद्रपद के लिए भी सकारात्मक संकेत मिले हैं, जिससे किसानों के चेहरे पर संतोष और उम्मीद दोनों नजर आए।

इंद्र देव की पूजा का विशेष महत्व

इस पूरे आयोजन में भगवान इंद्र की पूजा-अर्चना का विशेष स्थान होता है। हाली अमावस्या से एक दिन पहले बाजरा भिगोया जाता है और अगले दिन पारंपरिक तरीके से खींच (खिचड़ी) और गलवानी तैयार की जाती है। इसे भगवान इंद्र को भोग के रूप में अर्पित कर अच्छी बारिश की कामना की जाती है। पंचामृत बनाकर धरती, कुम्हार के चाक और देवताओं को अर्पित करने की परंपरा भी निभाई जाती है।

परंपरा में आज भी अटूट विश्वास

हालांकि इस विधि का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं माना जाता, लेकिन पीढ़ियों से चली आ रही इस परंपरा पर ग्रामीणों का अटूट विश्वास है। बुजुर्गों का कहना है कि कई बार इस तरीके से मिले संकेत वास्तविक मौसम के काफी करीब साबित हुए हैं। यही कारण है कि आधुनिक तकनीक के दौर में भी यह परंपरा आज जीवित है और ग्रामीण जीवन में अपनी खास पहचान बनाए हुए है।

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