Monday, March, 16,2026

परीक्षा प्रक्रिया पर सवाल नहीं उठा सकते असफल अभ्यर्थी

जयपुर: आरपीएससी द्वारा आयोजित सहायक अभियोजन अधिकारी (APO) भर्ती परीक्षा-2024 के विवादास्पद परिणामों पर राजस्थान हाई कोर्ट ने अपना विस्तृत फैसला जारी कर दिया है। जस्टिस समीर जैन की एकलपीठ ने आरपीएससी की मूल्यांकन प्रक्रिया को पूरी तरह वैध और निष्पक्ष करार देते हुए अभ्यर्थियों की सैकड़ों याचिकाएं खारिज कर दीं। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जो अभ्यर्थी नियमों को स्वीकार कर परीक्षा में शामिल होते हैं, वे असफल होने के बाद चयन प्रक्रिया को चुनौती नहीं दे सकते। इस फैसले से आरपीएससी को बड़ी राहत मिली है, जबकि असफल अभ्यर्थियों में निराशा देखी जा रही है।

याचिकाकर्ताओं ने दलील दी कि 2700 अभ्यर्थियों में से मात्र 4 का चयन होना मूल्यांकन प्रणाली में गंभीर खामी को दर्शाता है। इतनी बड़ी संख्या में पदों का रिक्त रहना स्वाभाविक नहीं है। उन्होंने आरोप लगाया कि मूल्यांकन प्रक्रिया पारदर्शी नहीं थी और सार्वजनिक भी नहीं की गई। कई अभ्यर्थियों ने यह भी तर्क दिया कि वे राजस्थान न्यायिक सेवा (RIS) जैसी कठिन परीक्षाओं में बेहतर प्रदर्शन कर चुके हैं, फिर भी एपीओ परीक्षा में असफल रहे।

भर्ती नियमों में मॉडरेशन, स्केलिंग या पुनर्मूल्यांकन का प्रावधान होने के बावजूद उसे लागू नहीं किया गया। याचिकाकर्ताओं ने परिणाम रद्द कर नई और निष्पक्ष मूल्यांकन प्रक्रिया अथवा पुनर्मूल्यांकन की मांग की। अधिवक्ता तनवीर अहमद ने कोर्ट में तर्क दिया कि परिणामों की असामान्यता मूल्यांकन में अनियमितता की ओर संकेत करती है।

भर्ती प्रक्रिया की पृष्ठभूमि और विवाद की जड़

आरपीएससी ने 7 मार्च 2024 को सहायक अभियोजन अधिकारी के 181 पदों के लिए विज्ञापन जारी किया था। यह भर्ती लगभग 10 वर्षों के अंतराल के बाद आयोजित की गई थी। प्रारंभिक परीक्षा के बाद करीब 2700 अभ्यर्थी मुख्य परीक्षा में शामिल हुए। मुख्य परीक्षा दो पेपरों पर आधारित थी। पेपर-1 (कानून) 300 अंक और पेपर-2 (हिंदी एवं अंग्रेजी भाषा) 100 अंक का था। नियमों के अनुसार, प्रत्येक पेपर में कम से कम 40% अंक प्राप्त करना अनिवार्य था। इसमें एससी/एसटी श्रेणी के अभ्यर्थियों को 5% की छूट दी गई। परीक्षा 1 जून, 2025 को आयोजित की गई थी, लेकिन 10 दिसंबर 2025 को घोषित परिणामों में केवल 4 अभ्यर्थी ही सफल घोषित किए गए, जिससे 177 पद रिक्त रह गए। इस अप्रत्याशित परिणाम ने अभ्यर्थियों में हड़कंप मचा दिया और उन्होंने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। सैकड़ों असफल अभ्यर्थियों ने हाई कोर्ट में याचिकाएं दायर की, जिसमें मूल्यांकन प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए गए।

मूल्यांकन में न मनमानी, ना ही पक्षपात

जस्टिस समीर जैन की एकलपीठ ने विस्तृत सुनवाई के बाद फैसला सुनाया। कोर्ट ने इन-कैमरा (गोपनीय) तरीके से उत्तर पुस्तिकाओं और मूल्यांकन रिकॉर्ड का परीक्षण किया और पाया कि मूल्यांकन में किसी प्रकार की मनमानी, पक्षपात या असंवैधानिकता नहीं है। कोर्ट ने कहा कि सभी उत्तर पुस्तिकाओं का मूल्यांकन समान मानकों के आधार पर किया गया। न्यायालय चयन प्रक्रिया की गुणवत्ता नहीं, बल्कि उसकी वैधता की समीक्षा करता है और ऐसा कोई साक्ष्य सामने नहीं आया जिससे मूल्यांकन को अवैध ठहराया जा सके। अदालत ने स्पष्ट किया कि अभ्यर्थी परीक्षा नियमों से पूर्णत अवगत थे और बिना आपत्ति परीक्षा में शामिल हुए। असफल होने के बाद प्रक्रिया को चुनौती देना एस्टॉपल और एक्वायसेंस के सिद्धांतों के विपरीत है। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कई निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि केवल चयन संख्या कम होने से पूरी प्रक्रिया अवैध नहीं हो जाती। भर्ती मानकों से समझौता करना लोकहित में नहीं है।

योग्यता से समझौता नहीं: आरपीएससी

सुनवाई के दौरान आरपीएससी और राज्य सरकार ने याचिकाओं का कड़ा विरोध किया। अधिवक्ता एम, एफ. बैग ने बताया कि भर्ती प्रक्रिया पूरी तरह नियमों के अनुरूप रही और किसी भी स्तर पर दुर्भावना या पक्षपात नहीं हुआ। उन्होंने कहा कि पहली बार सब्जेक्टिव पैटर्न अपनाया गया था, जिसका उद्देश्य गुणवत्ता आधारित चयन सुनिश्चित करना था। न्यूनतम अंक सीमा अभ्यर्थियों को पहले से ज्ञात थी और सभी ने नियमों को स्वीकार कर परीक्षा दी थी। केवल पद भरने के लिए मानकों को कम नहीं किया जा सकता। राज्य सरकार की ओर से भी जोर दिया गया कि अभियोजन अधिकारी का पद अत्यंत संवेदनशील है, योग्यता से किसी भी प्रकार का समझौता लोकहित के खिलाफ होगा।

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