Monday, March, 16,2026

78 साल के पति ने 75 साल की पत्नी से मांगा तलाक, कोर्ट की 'ना'

जयपुर: राजस्थान हाई कोर्ट ने एक बेहद संवेदनशील और विचारणीय मामले में 58 साल पुराने विवाह को बचाने का महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। 78 वर्षीय पति ने अपनी 75 वर्षीय पत्नी से तलाक की मांग की थी, लेकिन अदालत ने इसे पूरी तरह खारिज कर दिया। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि लंबे वैवाहिक जीवन में होने वाले रोजमर्रा के मतभेद, छोटी-मोटी तकरार या संपत्ति से जुड़े विवाद क्रूरता का आधार नहीं बन सकते। जस्टिस सुदेश बंसल और जस्टिस अनिल कुमार उपमन की खंडपीठ ने अपने फैसले में जोर दिया कि विवाह केवल कागजी या कानूनी समझौता नहीं है, बल्कि एक गहरी सामाजिक संस्था है। इसको समाप्त करने से पहले पूरे वैवाहिक जीवन की परिस्थितियों, परिवार पर पड़ने वाले प्रभाव और न्यायसंगत आधारों का गंभीर परीक्षण आवश्यक है। अदालत ने कहा कि जब दंपती ने छह दशक तक साथ निभाया हो और अब वृद्धावस्था में हों तो सामान्य असहमति को तलाक का कारण बनाना उचित नहीं।

पत्नी ने आरोपों को निराधार बतायाः पत्नी ने अदालत में कहा कि संपत्ति उनके नाम पर खरीदी गई थी और परिवार की आर्थिक सुरक्षा के लिए निर्णय लिए गए। उन्होंने पति पर अनियंत्रित खर्च का आरोप लगाया। बताया कि कुछ घटनाओं के कारण पुलिस में शिकायत दर्ज करानी पड़ी।

पारिवारिक न्यायालय ने पहले खारिज की थी याचिकाः पति ने 2014 में भरतपुर पारिवारिक न्यायालय में हिंदू विवाह अधिनियम के तहत तलाक की याचिका दायर की। अदालत ने सभी साक्ष्यों और दलीलों को सुनने के बाद 18 अक्टूबर 2019 को याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने माना कि विवाद मुख्य रूप से संपत्ति से जुड़ा है और इसे वैवाहिक क्रूरता नहीं कहा जा सकता। पति ने पारिवारिक न्यायालय के फैसले के खिलाफ हाई कोर्ट में अपील दायर की। उन्होंने तर्क दिया कि पत्नी की शिकायतें और आरोप मानसिक क्रूरता के दायरे में आते हैं, लेकिन खंडपीठ ने कहा कि वैवाहिक क्रूरता का आकलन करते समय पूरे जीवन को देखना आवश्यक है।

परिवार और समाज पर पड़ने वाले प्रभाव

अदालत ने कहा कि वृद्धावस्था में रिश्ता तोड़ने से न केवल पत्नी, बल्कि पूरे परिवार की गरिमा, सम्मान और सामाजिक प्रतिष्ठा प्रभावित होगी। हर घर में छोटे-मोटे झगड़े आम हैं। इन्हें क्रूरता मानकर 58 साल पुराना बंधन खत्म नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने जोर दिया कि लंबे समय तक साथ रहने से सहनशीलता और समझ विकसित होती है। हाई कोर्ट ने पति की अपील खारिज कर दी और पारिवारिक न्यायालय के फैसले को सही ठहराया।

छह दशक तक बड़ी शिकायत नहीं, साथ बिताया जीवन

दंपती का विवाह 29 जून 1967 को हिंदू रीति-रिवाजों से संपन्न हुआ था। दोनों ने लगभग 46 वर्ष तक बिना किसी गंभीर विवाद के साथ जीवन व्यतीत किया। उनके तीन संतान दो पुत्र और एक पुत्री हैं, जो अब पूरी तरह वयस्क होकर अपने-अपने परिवारों के साथ रह रहे हैं। वर्ष 2013 तक दोनों के बीच कोई बड़ा वैवाहिक मतभेद दर्ज नहीं हुआ। 2013 के बाद परिवार की संपत्ति के बंटवारे और उसके हस्तांतरण को लेकर दोनों के विचार अलग-अलग हो गए। पति ने आरोप लगाया कि पत्नी बड़े बेटे के प्रभाव में आ गई है और संपत्ति केवल उसी के नाम करना चाहती है। उन्होंने यह भी कहा कि सेवानिवृत्ति के बाद पत्नी का व्यवहार उपेक्षापूर्ण हो गया। साथ ही, पत्नी द्वारा दर्ज कराई गई आपराधिक शिकायत से उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा को ठेस पहुंची और उन्हें मानसिक कष्ट हुआ।

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