Friday, May, 01,2026

आरोपी की सहमति के बिना नार्को टेस्ट असंवैधानिकः हाई कोर्ट

जयपुर: राजस्थान हाई कोर्ट ने नार्को टेस्ट की वैधानिकता और आरोपी के मौलिक अधिकारों को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी भी आरोपी को उसकी इच्छा के विरुद्ध नार्को एनालिसिस, पॉलीग्राफ या ब्रेन मैपिंग जैसे परीक्षणों के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। यहां तक कि यदि आरोपी ने पहले सहमति दी हो, तब भी वह बाद में उसे वापस लेने का पूर्ण अधिकार रखता है। जस्टिस अनूप कुमार ढंढ की एकलपीठ ने झुंझुनूं निवासी सुभाष सैनी की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया। कोर्ट ने निचली अदालत की ओर से पारित 18 मई, 2015 और 9 जुलाई, 2015 के आदेशों को रद्द करते हुए कहा कि सहमति को अपरिवर्तनीय नहीं माना जा सकता।

चुप रहने का अधिकार न्याय प्रणाली की आधारशिला

अदालत ने अपने फैसले में कहा कि 'राइट टू रिमेन साइलेंट' यानी चुप रहने का अधिकार आपराधिक न्याय प्रणाली की आधारशिला है। किसी भी आरोपी को स्वयं के खिलाफ साक्ष्य देने के लिए मजबूर करना संविधान के अनुच्छेद 20 (3) का उल्लंघन है, जो आत्म-अभियोग से संरक्षण प्रदान करता है। साथ ही, अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार को भी सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है। मामले के अनुसार, चिड़ावा थाने में दर्ज एक मुकदमे की जांच के दौरान पुलिस ने आरोपी के नार्को टेस्ट की अनुमति मांगी थी। आरोपी ने प्रारंभ में सहमति दे दी थी, जिसके आधार पर मजिस्ट्रेट ने टेस्ट की अनुमति दे दी। हालांकि बाद में आरोपी ने यह कहते हुए अपनी सहमति वापस ले ली कि उसे अपने ही खिलाफ साक्ष्य देने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। इसके बावजूद निचली अदालत ने उसकी अर्जी खारिज कर दी, जिसे हाई कोर्ट में चुनौती दी गई। याचिकाकर्ता की ओर से यह दलील दी गई कि प्रारंभिक सहमति परिस्थितिजन्य थी और बाद में उसे अपने संवैधानिक अधिकारों की समझ आने पर उसने सहमति वापस ले ली। यह भी तर्क दिया गया कि नार्को टेस्ट के दौरान व्यक्ति अर्धचेतन अवस्था में होता है, जिससे वह अनजाने में अपने खिलाफ बयान दे सकता है, जो कि उसके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।

राज्य सरकार की दलील- स्वेच्छा से दी थी सहमति

राज्य सरकार की ओर से दलील दी गई कि आरोपी ने स्वेच्छा से सहमति दी थी और उसी आधार पर मजिस्ट्रेट ने आदेश पारित किया था, इसलिए बाद में सहमति वापस लेना उचित नहीं है। सरकार ने यह भी कहा कि जांच में सहयोग करना आरोपी का कर्तव्य है और इस तरह की कार्रवाई से जांच प्रभावित हो सकती है। इन सभी तर्कों पर विचार करते हुए हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जांच की आवश्यकता और आरोपी के मौलिक अधिकारों के बीच संतुलन जरूरी है, लेकिन किसी भी स्थिति में व्यक्ति की स्वतंत्रता और संवैधानिक सुरक्षा से समझौता नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के 2010 के ऐतिहासिक निर्णय सेल्वी बनाम स्टेट ऑफ कर्नाटक का हवाला देते हुए दोहराया कि बिना सहमति नार्को टेस्ट कराना असंवैधानिक है।

साथ ही अमलेश बनाम स्टेट ऑफ बिहार (2025) के फैसले का उल्लेख करते हुए कहा कि नार्को टेस्ट कराने का अधिकार पूर्ण नहीं है और इसकी अनुमति परिस्थितियों के आधार पर ही दी जा सकती है। फैसले में यह भी स्पष्ट किया गया कि नार्को टेस्ट से प्राप्त जानकारी सीधे तौर पर साक्ष्य के रूप में स्वीकार्य नहीं होती। हालांकि, यदि उस जानकारी के आधार पर कोई नया तथ्य या साक्ष्य सामने आता है, तो उसे भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 27 के तहत मान्यता दी जा सकती है। अंतत हाई कोर्ट ने कहा कि किसी भी आरोपी को उसकी इच्छा के विरुद्ध इस प्रकार के परीक्षण के लिए बाध्य करना न केवल असंवैधानिक है, बल्कि न्याय के मूल सिद्धांतों के भी खिलाफ है। यह फैसला भविष्य में ऐसे मामलों के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल माना जा रहा है, जिसमें व्यक्तिगत स्वतंत्रता और न्यायिक प्रक्रिया के बीच संतुलन का प्रश्न उठता है।

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