Thursday, May, 28,2026

SIR को संवैधानिक मंजूरी आधार नहीं नागरिकता का प्रमाण

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (विशेष गहन पुनरावृति एसआईआर) को वैध और संवैधानिक करार देते हुए चुनाव आयोग के अधिकारों को बड़ी मजबूती दी है। बुधवार को आए इस ऐतिहासिक फैसले में अदालत ने स्पष्ट किया कि चुनाव आयोग मतदाता सूची की शुद्धता बनाए रखने के लिए नागरिकता और पात्रता की जांच कर सकता है, लेकिन किसी व्यक्ति को अंतिम रूप से गैर-नागरिक घोषित करने का अधिकार उसके पास नहीं होगा। प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायाधीश जॉयमाल्या बागची की पीठ ने 124 पृष्ठों के फैसले में कहा कि मतदाता सूची तैयार करना और उसका रखरखाव कोई 'मशीनी कार्य' नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था की मूलभूत संवैधानिक जिम्मेदारी है। अदालत ने कहा कि निर्वाचन आयोग को यह अधिकार है कि वह मतदाता की पात्रता और निवास की पुष्टि के लिए आवश्यक दस्तावेजों का निर्धारण करे और उनका विश्वसनीयता के आधार पर वर्गीकरण भी कर सके। फैसले का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा आधार कार्ड और राशन कार्ड को लेकर अदालत की टिप्पणी रही। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आधार कार्ड नागरिकता का प्रमाण नहीं है। अदालत ने स्पष्ट किया कि आधार कानून इसे केवल पहचान स्थापित करने के सीमित उद्देश्य के लिए मान्यता देता है, न कि नागरिकता या स्थायी निवास के प्रमाण के रूप में। हालांकि अदालत ने चुनाव आयोग को निर्देश दिया कि वह आधार को 'अतिरिक्त 12वें दस्तावेज' के रूप में स्वीकार कर सकता है।

राशन कार्ड की साक्ष्य विश्वसनीयता सीमित

इसी तरह अदालत ने राशन कार्ड को भी नागरिकता का निर्णायक प्रमाण मानने से इनकार कर दिया। फैसले में कहा गया कि राशन कार्ड की साक्ष्य विश्वसनीयता सीमित है और चुनाव आयोग को अधिक विश्वसनीय दस्तावेजों को प्राथमिकता देने का अधिकार है। अदालत ने कहा कि आयोग द्वारा अपनाई गई दस्तावेजीकरण प्रक्रिया न तो मनमानी है और ना ही कानून के खिलाफ। सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को यह भी निर्देश दिया कि संदिग्ध नागरिकता के आधार पर जिन लोगों के नाम मतदाता सूची से हटाए गए हैं, उनकी सूची चार सप्ताह के भीतर केंद्र सरकार को भेजी जाए।

10 राज्यों और तीन केंद्र शासित प्रदेशों में प्रक्रिया पूरी

देश में जून 2025 में बिहार से शुरू हुई एसआईआर प्रक्रिया अब तक 10 राज्यों और तीन केंद्र शासित प्रदेशों में पूरी हो चुकी है। इस अभियान के तहत कुल 7.41 करोड़ नाम मतदाता सूची से हटाए गए हैं। इनमें सबसे अधिक 2.89 करोड़ नाम उत्तरप्रदेश से हटे हैं। अदालत के फैसले को चुनाव आयोग की स्वायत्तता और मतदाता सूची की शुद्धता बनाए रखने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अदालत ने कहा कि लोकतंत्र की मजबूती के लिए यह जरूरी है कि मतदाता सूची सटीक, पारदर्शी और विश्वसनीय हो।

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