Monday, March, 16,2026

राज्य सरकार को HC का आदेश MLR के लिए बनाएं गाइडलाइन

जयपुर: राजस्थान हाई कोर्ट की जयपुर पीठ ने एक महत्वपूर्ण आदेश में कहा है कि आपराधिक मामलों में डॉक्टरों की ओर से तैयार की जाने वाली मेडिको-लीगल रिपोर्ट (एमएलआर) यदि अस्पष्ट, अधूरी या केवल अनुमान पर आधारित हो तो इससे न्यायिक प्रक्रिया गंभीर रूप से प्रभावित हो सकती है। अदालत ने स्पष्ट किया कि 'माइट बी डेंजरस' या 'संभवतः जानलेवा' जैसे शब्दों पर आधारित चिकित्सकीय राय को विशेषज्ञ राय नहीं माना जा सकता।

जस्टिस चंद्रप्रकाश श्रीमाली ने एक जमानत याचिका की सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी करते हुए राजस्थान सरकार को निर्देश दिया कि राज्य के सभी सरकारी डॉक्टरों के लिए एक समान और स्पष्ट मेडिको-लीगल गाइडलाइन तैयार की जाए, ताकि अदालतों को भविष्य में सटीक, वैज्ञानिक और विश्वसनीय मेडिकल राय प्राप्त हो सके।

हाई कोर्ट ने यह भी चेतावनी दी कि यदि चिकित्सकीय राय ठोस वैज्ञानिक आधार पर नहीं होगी तो इससे निर्दोष व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई या अपराधी के बच निकलने की संभावना बढ़ सकती है। हाई कोर्ट ने कहा कि आपराधिक मामलों में डॉक्टरों की राय कई बार सबसे महत्वपूर्ण साक्ष्य बन जाती है और अदालतें इसे विशेषज्ञ मत मानकर उस पर भरोसा करती हैं।

जमानत याचिका की सुनवाई में उठे अहम सवाल

यह मामला करौली जिले के श्रीमहावीरजी थाना क्षेत्र में दर्ज एक आपराधिक प्रकरण से जुड़ा है। आरोप था कि आरोपी गौतम ने अमर सिंह पर हमला कर उसे गंभीर चोट पहुंचाई। एफआईआर में आरोप लगाया गया था कि आरोपी ने फावड़े से सिर पर वार किया, जबकि जांच के दौरान गवाहों और घायल के बयान में कहा गया कि हमला लाठी से किया गया था। अदालत ने इस विरोधाभास को महत्वपूर्ण मानते हुए कहा कि जांच के दौरान हथियार के संबंध में स्पष्टता जरूरी है। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता स्वप्रिल सिंह पटेल ने दलील दी कि अभियोजन की कहानी में कई विरोधाभास हैं और चिकित्सकीय रिपोर्ट भी स्पष्ट नहीं है। उन्होंने कहा कि सामान्य टिप्पणी को गंभीर अपराध सिद्ध करने का आधार नहीं बनाया जा सकता।

मेडिकल रिपोर्ट में पाई गई गंभीर कमियां

सुनवाई के दौरान अदालत के सामने प्रस्तुत मेडिकल रिपोर्ट में कई महत्वपूर्ण कमियां सामने आई। कोर्ट ने पाया कि रिपोर्ट में चोट की लंबाई, चौड़ाई और गहराई का स्पष्ट उल्लेख नहीं था। चोट किस प्रकार के हथियार से लगी, इसका विवरण नहीं दिया गया। यह भी स्पष्ट नहीं किया गया कि चोट सामान्य परिस्थितियों में मृत्यु का कारण बन सकती थी या नहीं। अदालत ने कहा कि ऐसी अधूरी रिपोर्ट न्यायिक प्रक्रिया को भ्रमित कर सकती है।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला

कोर्ट ने अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का उल्लेख करते हुए कहा कि यदि विशेषज्ञ की रिपोर्ट अधूरी या सतही हो तो उसका विशेष महत्व नहीं रह जाता। विशेषज्ञ राय तभी उपयोगी होती है, जब उसमें तथ्यों का विश्लेषण, वैज्ञानिक आधार और स्पष्ट निष्कर्ष मौजूद हों। हाई कोर्ट ने कहा कि अस्पष्ट मेडिकल रिपोर्ट केवल तकनीकी कमी नहीं है, बल्कि यह संविधान से जुड़े अधिकारों का भी प्रश्न है। अदालत के अनुसार अनुच्छेद 21 प्रत्येक व्यक्ति को निष्पक्ष न्याय प्रक्रिया का अधिकार देता है। अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता का अधिकार सुनिश्चित करता है। यदि अलग-अलग मामलों में अलग गुणवत्ता की मेडिकल रिपोर्ट तैयार की जाती है तो इससे न्याय में असमानता पैदा हो सकती है।

राज्य सरकार को मानकीकृत गाइडलाइन बनाने के निर्देश

हाई कोर्ट ने राजस्थान के मुख्य सचिव को निर्देश दिया कि स्वास्थ्य विभाग के माध्यम से राज्य के सभी सरकारी डॉक्टरों के लिए मानकीकृत मेडिको-लीगल दिशा निर्देश तैयार किए जाएं। इन दिशा-निर्देशों में हर मेडिकल रिपोर्ट में चोट की प्रकृति और प्रकार, शरीर के किस हिस्से पर चोट लगी, चोट का आकार, लंबाई और गहराई, संभावित हथियार या उपकरण, चोट के तत्काल और दीर्घकालिक प्रभाव की जानकारी अनिवार्य रूप से शामिल करने के निर्देश दिए गए हैं।

पुलिस विभाग को भी दिए कोर्ट ने निर्देश

हाई कोर्ट ने पुलिस विभाग को भी निर्देश दिया कि जांच अधिकारी डॉक्टरों से प्राप्त मेडिकल रिपोर्ट को बिना जांचे स्वीकार न करें। पुलिस को यह सुनिश्चित करना होगा कि रिपोर्ट में हर चोट को स्पष्ट रूप से साधारण, गंभीर या जानलेवा श्रेणी में वर्गीकृत किया गया हो। अदालत ने यह भी कहा कि 'माइट बी डेंजरस' या 'संभवतः जानलेवा' जैसे शब्दों का प्रयोग तभी किया जाए जब उसके पीछे स्पष्ट चिकित्सा आधार दिया गया हो। अदालत ने कहा कि यदि कोई डॉक्टर या अधिकारी मेडिको-लीगल रिपोर्ट तैयार करने में लापरवाही करता है तो उसके खिलाफ प्रशासनिक या अनुशासनात्मक कार्रवाई की जा सकती है।

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