Thursday, April, 30,2026

सांसद-विधायक निधि पर टैक्स की मार क्यों?

जयपुर: सांसद और विधायकों को अपने-अपने क्षेत्रों में स्थानीय विकास कार्यों के लिए मिलने वाली निधियों पर जीएसटी का मुद्दा एक बार फिर चर्चा में है। जनप्रतिनिधियों का कहना है कि जनता के हित में उपयोग होने वाली इस राशि पर टैक्स लगने से वास्तविक विकास कार्यों के लिए उपलब्ध रकम घट जाती है, जिससे कई जरूरी योजनाएं प्रभावित होती हैं।

सांसद स्थानीय क्षेत्र विकास योजना (MPLADS) के तहत प्रत्येक सांसद को हर वर्ष 5 करोड़ रुपए की राशि दी जाती है। इस निधि का उपयोग सड़क, पेयजल, स्वास्थ्य, शिक्षा, सामुदायिक भवन और अन्य बुनियादी सुविधाओं के विकास के लिए किया जाता है। योजना का उद्देश्य स्थानीय जरूरतों के अनुरूप विकास कार्यों को तेजी देना है, लेकिन व्यवहार में पूरी राशि विकास कायों तक नहीं पहुंच पाती।

नियमों के अनुसार, कुल 5 करोड़ रुपए में से लगभग 10 लाख रुपए प्रशासनिक और स्थानीय प्राधिकरणों के खर्च के लिए अलग रखे जाते हैं। इसके बाद बची हुई राशि पर 9 प्रतिशत सीजीएसटी और 9 प्रतिशत एसजीएसटी, यानी कुल 18 प्रतिशत जीएसटी लागू होता है। इस कारण विकास कार्यों के लिए उपलब्ध वास्तविक राशि में उल्लेखनीय कमी आ जाती है। जनप्रतिनिधियों का तर्क है कि यह स्थिति 'डबल टैक्स' जैसी है। उनका कहना है कि यह निधि स्वयं भी जनता के कर से ही बनती है और फिर उसी राशि से होने वाले विकास कार्यों पर दोबारा टैक्स लगाया जाता है। इससे योजनाओं का दायरा सीमित हो जाता है और कई परियोजनाएं अधूरी रह जाती हैं।

विकास की रफ्तार पर असर

सिर्फ सांसद निधि ही नहीं, बल्कि राजस्थान में विधायकों को मिलने वाले विधायक स्थानीय क्षेत्र विकास कोष पर भी यही स्थिति लागू होती है। विधायकों को भी हर वर्ष 5 करोड़ रुपए की राशि दी जाती है, लेकिन जीएसटी लागू होने के कारण वास्तविक विकास कार्यों की राशि घटकर करीब 4 करोड़ रुपए के आसपास रह जाती है। जनप्रतिनिधियों का कहना है कि जीएसटी के कारण परियोजनाओं की लागत बढ़ जाती है, जिससे कम कार्य पूरे हो पाते हैं। इसके अलावा भुगतान प्रक्रिया में जटिलता के चलते कई बार विकास कार्यों में देरी भी होती है। यही वजह है कि समय-समय पर इन निधियों को जीएसटी से मुक्त करने या राहत देने की मांग उठती रही है।

वास्तविक विकास राशिः लगभग 4.10 करोड़ रुपए

इस स्थिति को देखते हुए अब यह सवाल उठ रहा है कि जब इन निधियों का उद्देश्य सीधे जनता के हित में विकास कार्यों को बढ़ावा देना है, तो क्या इन्हें कर से राहत मिलनी चाहिए? यह बहस अब राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में तेज होती जा रही है।

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