Tuesday, September, 08,2026

अरावली पर 6 महीने की मोहलत नहीं मिलेगी: सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली: अरावली पर्वतमाला की परिभाषा और संरक्षण से जुड़े अहम मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को हाई-पावर्ड कमेटी को छह महीने की अतिरिक्त मोहलत देने से इनकार कर दिया। अदालत ने समिति को 30 नवंबर तक अंतिम रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया है। साथ ही साफ चेतावनी दी कि तय समय सीमा में रिपोर्ट नहीं आई तो पूरी समिति का पुनर्गठन किया जा सकता है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायाधीश जॉयमाल्या बागची एवं न्यायाधीश वी. मोहना की पीठ ने सुनवाई के दौरान समिति से रिपोर्ट तैयार करने में तेजी लाने को कहा। प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि समिति को अरावली के मुद्दे पर रिपोर्ट सौंपने के लिए दिन-रात काम करना चाहिए।

उन्होंने कहा कि यदि समिति दो महीने में काम पूरा नहीं कर पाती है तो पूरे पैनल का पुनर्गठन किया जाएगा। मामले की अगली सुनवाई 2 दिसंबर को होगी। हाई-पावर्ड कमेटी ने अदालत से अंतिम रिपोर्ट सौंपने की समय सीमा छह महीने बढ़ाकर फरवरी 2027 तक करने का अनुरोध किया था। समिति का कहना था कि अरावली पर्वतमाला का व्यापक और वैज्ञानिक आकलन करने के लिए अतिरिक्त समय की आवश्यकता है। हालांकि, अदालत ने इस मांग को स्वीकार नहीं किया।

100 मीटर ऊंचाई के मानक से शुरू हुआ विवाद

अरावली की परिभाषा को लेकर विवाद पिछले वर्ष नवंबर में उस समय गहरा गया था, जब सुप्रीम कोर्ट ने एक समिति की सिफारिश के आधार पर अरावली पहाड़ियों की पहचान के लिए 100 मीटर ऊंचाई के मानक को स्वीकार किया था। पर्यावरण विशेषज्ञों ने आशंका जताई कि इस मानक से अरावली के बड़े हिस्से संरक्षण के दायरे से बाहर हो सकते हैं। इसके बाद दिसंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश को फिलहाल स्थगित करते हुए मामले की व्यापक और स्वतंत्र विशेषज्ञ समीक्षा का रास्ता खोला। अदालत ने अरावली की परिभाषा, संरक्षण, संभावित खनन प्रभाव और पर्यावरणीय निरंतरता जैसे पहलुओं की समीक्षा के लिए हाई-पावर्ड कमेटी गठित की।

पहाड़ नहीं, पूरे इकोसिस्टम का होगा आकलन

समिति ने अपनी अंतरिम रिपोर्ट में अरावली को केवल पहाड़ियों या ऊंचाई के आधार पर परिभाषित करने के बजाय इकोसिस्टम आधारित दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत बताई है। इसमें जंगल, जलग्रहण क्षेत्र, भूजल, जैव विविधता, पारिस्थितिक
संपर्क और स्थानीय समुदायों की आजीविका जैसे पहलुओं को शामिल किया गया है। समिति को राज्यों, पर्यावरणविदों, संरक्षण संगठनों, खनन क्षेत्र, किसानों और स्थानीय समुदायों से सुझाव लेने का भी निर्देश दिया गया है।

30 नवंबर की रिपोर्ट पर टिकी निगाहें

अब समिति के सामने सीमित समय में अपना वैज्ञानिक आकलन पूरा करने की चुनौती है। उसकी अंतिम रिपोर्ट अरावली की सीमा और परिभाषा के साथ-साथ खनन, संरक्षण और भूमि उपयोग से जुड़े भविष्य के फैसलों के लिए अहम आधार बनेगी। अरावली का प्रभाव दिल्ली-एनसीआर से लेकर हरियाणा, राजस्थान और गुजरात तक फैला है। सुप्रीम कोर्ट की तय 30 नवंबर की समय सीमा पर राज्यों, पर्यावरण विशेषज्ञों और स्थानीय समुदायों की नजर रहेगी।

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