Thursday, January, 29,2026

प्रदेश के 3,768 स्कूल भवन जर्जर और 446 के पास भवन ही नहीं

झालावाड़ के पिपलोदी गांव में स्कूल भवन गिरने से सात मासूम बच्चों की मौत ने राजस्थान की शिक्षा व्यवस्था की जमीनी सच्चाई को एक बार फिर बेनकाब कर दिया था। इस दर्दनाक हादसे के बाद सरकार हरकत में आई और सभी जिला कलेक्टरों को प्रदेशभर में जर्जर स्कूल भवनों और भवन रहित विद्यालयों को चिह्नित करने के निर्देश दिए गए। अब यह सर्वे पूरा हो चुका है और सामने आए आंकड़े बेहद चिंताजनक हैं। सरकारी रिपोर्ट के अनुसार, प्रदेश में कुल 3,768 जर्जर स्कूल भवन और 446 भवन रहित विद्यालय चिह्नित किए गए हैं यानी हजारों बच्चे ऐसे स्कूलों में पढ़ने को मजबूर थे, जहां हर दिन उनकी जान जोखिम में रहती थी। इन आंकड़ों ने न सिर्फ शिक्षा विभाग की कार्य प्रणाली पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि पूर्ववर्ती सरकारों और जनप्रतिनिधियों की वर्षों की अनदेखी को भी उजागर किया है।

आंकड़े बताते हैं कि सबसे ज्यादा जर्जर स्कूल आदिवासी बहुल जिलों में हैं। दुर्गम इलाकों, पहाड़ी क्षेत्रों और सीमावर्ती जिलों में हालात और भी गंभीर हैं। यहां न केवल भवन जर्जर हैं, बल्कि संसाधनों की कमी, शिक्षकों की कमी और प्रशासनिक निगरानी का अभाव भी साफ नजर आता है। यह वही इलाके हैं, जहां शिक्षा ही सामाजिक और आर्थिक बदलाव का एकमात्र रास्ता मानी जाती है। इसके उलट, नागौर और फलौदी जैसे जिलों में स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर बताई जा रही है। यहां दानदाताओं, भामाशाहों और स्थानीय सहयोग से स्कूल भवनों का निर्माण और रख-रखाव किया गया। यह उदाहरण साबित करता है कि यदि इच्छाशक्ति हो तो समाधान संभव है, लेकिन सवाल यह है कि क्या यह जिम्मेदारी केवल दानदाताओं पर छोड़ी जानी चाहिए?

सुरक्षा अहम मुद्दा
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विशेषज्ञों का मानना है कि जर्जर स्कूल भवनों की पिछले कई वर्षों से समस्या बनी हुई है, लेकिन सत्ता में रही सरकारें इसे प्राथमिकता देने में विफल रहीं। चुनावों के दौरान शिक्षा सुधार बड़े मुद्दे बने, लेकिन जमीनी स्तर पर भवनों की मरम्मत, पुनर्निर्माण और नए स्कूल निर्माण को लगातार टाला गया। कई क्षेत्रों में तो जनप्रतिनिधियों ने विकास निधियों का उपयोग अन्य मदों में कर दिया, जबकि स्कूल भवन बच्चों की सुरक्षा से जुड़ा सबसे अहम मुद्दा था।

विभाग का दावा

झालावाड़ हादसे के बाद सरकार ने जर्जर स्कूलों को लेकर एक्शन प्लान बनाने की बात कही है। शिक्षा विभाग का दावा है कि प्राथमिकता के आधार पर सबसे खतरनाक भवनों को तुरंत खाली कर वैकल्पिक व्यवस्था की गई। साथ ही नए भवनों के निर्माण और मरम्मत के लिए बजटीय प्रावधान किए गए हैं। हालांकि शिक्षा से जुड़े जानकारों का कहना है कि जब तक जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति से इनकार नहीं किया जा सकता।

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