Thursday, January, 29,2026

'वकीलों को न हड़ताल का हक, ना ही सांकेतिक बहिष्कार का'

जयपुर: राजस्थान हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि किसी आरोपी की गरीबी उसके जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार में बाधा नहीं बन सकती। कोर्ट ने यह भी कहा कि वकीलों को न तो हड़ताल करने का अधिकार है और ना ही न्यायिक कार्य के सांकेतिक बहिष्कार का, क्योंकि इससे न्याय प्रणाली की कार्य प्रणाली प्रभावित होती है।

राजस्थान हाई कोर्ट की जयपुर पीठ के जस्टिस अनूप कुमार ढंड ने एनडीपीएस एक्ट के तहत दोषसिद्ध आरोपी राजेश कुशवाह की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह महत्वपूर्ण टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि वकीलों की हड़ताल और न्यायिक कार्य का बहिष्कार विचाराधीन कैदियों और बंदियों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है, विशेष रूप से तब, जब मामला किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़ा हो। कोर्ट ने कहा कि हड़तालों के कारण अदालतों का काम ठप होना अस्वीकार्य है, क्योंकि इससे न्याय की प्रक्रिया बाधित होती है।

जस्टिस ढंड ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले Ex-Capt. Harish Uppal बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (2003) का हवाला
देते हुए कहा कि वकीलों को न तो हड़ताल करने का अधिकार है और ना ही सांकेतिक बहिष्कार का। उन्होंने कहा कि इस तरह की हड़ताले न्याय चाहने वाले आम नागरिकों को 'बंधक' बना लेती हैं और न्याय व्यवस्था को ठप कर देती हैं। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी भी समस्या का समाधान संवाद, बहस और लोकतांत्रिक प्रक्रिया से निकलता है, न कि न्यायिक कार्य के बहिष्कार से।

गरीबी सजा का आधार नहीं

हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि गरीबी को सजा का आधार नहीं बनाया जा सकता। जस्टिस ढंड ने सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले CBI बनाम अशोक सिरपाल का हवाला देते हुए कहा कि जुर्माना जमा करने की शर्त ऐसी नहीं होनी चाहिए, जिसे पूरा करना असंभव हो। उन्होंने यह भी कहा कि जब अधिवक्ता न्यायालय का बहिष्कार करते हैं तो यह सीधे संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त त्वरित न्याय के अधिकार का उल्लंघन है। अदालत ने उल्लेख किया कि प्रस्तावित वकील संशोधन विधेयक-2025 में भी अधिवक्ताओं द्वारा न्यायिक कार्य के बहिष्कार पर रोक लगाने का प्रावधान किया गया है। हाई कोर्ट ने माना कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में विरोध और असहमति व्यक्त करना एक मौलिक अधिकार है, लेकिन यह अधिकार शांतिपूर्ण, अहिंसक और न्यायिक प्रक्रिया को बाधित किए बिना ही प्रयोग किया जाना चाहिए।

व्यक्तिगत स्वतंत्रता का उल्लंघन

हाई कोर्ट ने कहा कि यदि किसी आरोपी को सजा निलंबन के दौरान लगाई गई शर्तों को पूरा न कर पाने के कारण जेल में रहना पड़ता है और वह केवल गरीबी के कारण जुर्माना भरने में असमर्थ है तो यह उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता और अपील के अधिकार का उल्लंघन है। अदालत ने आरोपी राजेश कुशवाह की स्थिति को ध्यान में रखते हुए उसकी रिहाई के आदेश दिए। राजेश कुशवाह 10 वर्ष की सजा काट रहा था और 7 वर्ष 11 महीने से जेल में था।

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