Monday, May, 04,2026

ऊपर राजनीति में अटकी राह, नीचे पंचायतों में मिल रही आधी हिस्सेदारी

जयपुर: महिलाओं को संसद और विधानसभाओं में आरक्षण देने का मुद्दा अभी भी राजनीतिक दलों के बीच सहमति के अभाव में अटका हुआ है। अलग-अलग दलों के अपने-अपने राजनीतिक समीकरण और शर्तों के चलते नारी शक्ति वंदन विधेयक अब तक पारित नहीं हो पाया है। शीर्ष स्तर पर महिलाओं की भागीदारी को लेकर यह असहमति जहां साफ दिखती है. वहीं लोकतंत्र के सबसे निचले पायदान पंचायतीराज संस्थाओं में महिलाएं पहले से ही लगभग आधी हिस्सेदारी निभा रही हैं। इसके उलट लोकसभा और विधानसभा जैसे बड़े मंचों पर उनको भागीदारी अब भी सीमित है।

पंचायती राज मंत्रालय के ताजा आंकड़ों के अनुसार देश में कुल 24.41 लाख निर्वाचित जनप्रतिनिधियों में से करीब 12.14. लाख (49.75%) महिलाएं हैं। यह आंकड़ा न सिर्फ संविधान में तय न्यूनतम 33% आरक्षण से अधिक है, बल्कि यह भी दिखाता है कि जमीनी स्तर पर महिलाओं की भागीदारी कहीं ज्यादा मजबूत है। दरअसल, देश के 21 राज्यों और 2 केंद्र शासित प्रदेशों ने पंचायतीराज संस्थाओं में महिलाओं के लिए 50% तक आरक्षण लागू कर दिया है। इसका असर यह हुआ कि महिलाएं अब न केवल प्रतिनिधित्व कर रही हैं, बल्कि नेतृत्व और निर्णय प्रक्रिया में भी सक्रिय भूमिका निभा रही हैं।

जमीनी स्तर पर मजबूत, ऊपर कमजोर

पंचायतों में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी के बावजूद बड़े चुनावों में तस्वीर अलग है। लोकसभा और विधानसभा में महिलाओं की हिस्सेदारी अब भी अपेक्षाकृत कम है, जिससे यह सवाल उठता है कि राजनीतिक दलों ने जमीनी स्तर पर महिलाओं की भूमिका को स्वीकार तो किया है, लेकिन शीर्ष स्तर पर अब भी पूरी तरह जगह नहीं दी है। नारी शक्ति वंदन विधेयक इसी अंतर को पाटने की कोशिश है, लेकिन इसका असर आने वाले चुनावों में ही स्पष्ट हो पाएगा।

प्रदेश में 50% से ज्यादा भागीदारी

राजस्थान में पंचायतीराज संस्थाओं में महिलाओं की भागीदारी मजबूत नजर आती है। राज्य में 50% तक आरक्षण लागू होने के कारण बड़ी संख्या में महिलाएं जनप्रतिनिधि के रूप में सक्रिय हैं। जमीनी स्तर पर करीब आधी से ज्यादा सीटों पर महिलाओं की मौजूदगी दिखाती है कि पंचायत स्तर पर महिला नेतृत्व सशक्त हुआ है और यह नीतिगत आरक्षण का प्रत्यक्ष प्रभाव है। 2020-21 के पंचायतीराज चुनाव में 6993 में से 3968 पंचायत समिति सदस्य महिलाएं चुनी गई। इसी तरह जिला परिषद के 1014 सदस्यों में से 552 और 11311 सरपंचों में से 6225 महिलाएं चुनी गई। कई राज्यों ने पंचायतों में महिलाओं की मजबूत भागीदारी सुनिश्चित की है। आंध्र प्रदेश, बिहार, एमपी, तमिलनाडु व यूपी जैसे राज्यों में पंचायतों की बड़ी संख्या में महिलाएं निर्वाचित हैं, जहां 50% आरक्षण का सीधा असर दिख रहा है।

चुनौतियां भी बरकरार

पंचायतों में बढ़ी भागीदारी के बावजूद 'सरपंच पति' या प्रॉक्सी प्रतिनिधित्व जैसी समस्याएं जब भी सामने आती हैं। इस पर केंद्र सरकार ने भी चिंता जताई है और इसे खत्म करने के लिए समितियों और प्रशिक्षण कार्यक्रमों की पहल की गई है। सरकार द्वारा महिला जनप्रतिनिधियों को बड़े पैमाने पर प्रशिक्षण भी दिया जा रहा है, ताकि वे अपने अधिकारों और जिम्मेदारियों को बेहतर तरीके से निभा सकें।

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