Thursday, January, 29,2026

शैक्षणिक सत्र के दौरान तबादलों पर हाई कोर्ट की फटकार

जयपुर: राजस्थान हाई कोर्ट ने शैक्षणिक सत्र के दौरान शिक्षकों, विशेष रूप से स्कूल प्रिंसिपलों के सामूहिक तबादलों को अनुचित ठहराते हुए राज्य सरकार की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। कोर्ट ने ट्रांसफर पॉलिसी के अभाव, राजस्थान सिविल सर्विस अपीलेट ट्रिब्यूनल (रेट) की कार्यप्रणाली और शिक्षा व्यवस्था में प्रशासनिक मनमानी को लेकर कड़ी टिप्पणियां की। हाई कोर्ट की एकलपीठ ने न्यायाधीश अशोक कुमार जैन की अध्यक्षता में सीनियर सेकेंडरी स्कूल प्रिंसिपल हरगोविंद मीणा की याचिका पर सुनवाई करते हुए उनके तबादला आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी। कोर्ट ने टिप्पणी करते हुआ कहा कि राज्य में शिक्षा व्यवस्था छात्रों की जरूरतों के अनुसार नहीं, बल्कि अफसरों की मनमानी से संचालित हो रही है।

कोर्ट ने पूछा कि राज्य में अब तक ट्रांसफर पॉलिसी क्यों नहीं बनाई गई? अधिकांश राज्यों में न तो व्यापक ट्रांसफर पॉलिसी है और ना ही कर्मचारियों विशेषकर शिक्षकों के ट्रांसफर को नियंत्रित करने के विशेष नियम। कोर्ट ने सुझाव दिया कि शिक्षकों के ट्रांसफर गर्मियों की छुट्टियों (डेढ़ माह के समर वेकेशन) के दौरान किए जाने चाहिए, ताकि शैक्षणिक सत्र प्रभावित न हो।

विद्यार्थी भी सीधे तौर पर प्रभावित

अदालत ने कहा कि शिक्षा कैलेंडर की पूरी जानकारी होने के बावजूद राज्य सरकार ने सितंबर 2025 में शैक्षणिक सत्र के मध्य 4,527 सीनियर सेकेंडरी स्कूल प्रिंसिपलों के सामूहिक तबादले कर दिए। कोर्ट ने इस प्रक्रिया को 'निंदनीय परंपरा' बताते हुए कहा कि इससे केवल शिक्षक ही नहीं, बल्कि प्रदेश के 4,527 स्कूलों के विद्यार्थी भी सीधे तौर पर प्रभावित होते हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि सत्र प्रारंभ होने के बाद बीच में तबादले करने से शिक्षा व्यवस्था अस्त-व्यस्त होती है और इसका दुष्प्रभाव शिक्षकों, उनके परिवारों तथा विद्यार्थियों पर पड़ता है।

चेयरमैन-सदस्यों को विशेष प्रशिक्षण का निर्देश

याचिकाकर्ता हरगोविंद मीणा का यह 5 महीने में दूसरा ट्रांसफर था। कोर्ट ने कहा कि रेट ने समान मामलों में अलग-अलग फैसले लिए, जिससे निष्पक्षता पर संदेह पैदा होता है। कुछ मामलों में ट्रांसफर पर स्टे दिया गया, जबकि इसी तरह के मामले में याचिकाकर्ता की शिकायत पर मैरिट को नजरअंदाज कर दुर्भावनापूर्ण रवैया अपनाया गया। अदालत ने रेट चेयरमैन और सदस्यों से निष्पक्ष आचरण की अपेक्षा जताते हुए कहा कि जब रेट सरकारी कर्मचारियों की शिकायतों का प्राथमिक मंच है, तो ऐसी स्थिति में कोर्ट आंखें बंद नहीं कर सकता। कोर्ट ने कार्मिक विभाग को निर्देश दिए कि रेट के चेयरमैन और सदस्यों को विशेष प्रशिक्षण प्रदान किया जाए, ताकि भविष्य में ऐसी गलतियां न हों। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता रामरख शर्मा ने प्रभावी पैरवी की।

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