Wednesday, February, 04,2026

'कानून सुरक्षा के लिए है, भविष्य तबाह करने के लिए नहीं'

जयपुर: राजस्थान हाई कोर्ट ने पॉक्सो एक्ट के दुरुपयोग पर गंभीर चिंता जताते हुए केंद्र सरकार को 'रोमियो जूलियट क्लॉज' जोड़ने का स्पष्ट सुझाव दिया है। अदालत ने कहा कि यह कठोर कानून बच्चों की सुरक्षा के लिए है, न कि आपसी सहमति से बने किशोर संबंधों को अपराध बनाकर युवाओं का भविष्य बर्बाद करने के लिए।

जस्टिस अनिल कुमार उपमन की एकलपीठ ने एक मामले की सुनवाई के दौरान माना कि देशभर में पॉक्सो के तहत दर्ज मामलों का बड़ा हिस्सा 'रोमियो जूलियट' प्रकृति का है। ऐसे मामलों में दो किशोर या किशोर-युवा आपसी सहमति से रिश्ते में होते हैं, लेकिन उम्र के तकनीकी अंतर या परिवार की असहमति के कारण पूरा मामला गंभीर आपराधिक मामले में बदल जाता है। हाई कोर्ट ने कहा कि पॉक्सो जैसे कठोर कानून का मकसद बच्चों को यौन शोषण से बचाना है, न कि आपसी सहमति से बने किशोर या युवा संबंधों को अपराध घोषित कर उनका भविष्य तबाह करना। अदालत की यह टिप्पणी केवल कानून की व्याख्या नहीं, बल्कि समाज और शासन दोनों के लिए चेतावनी है। सुप्रीम कोर्ट और राजस्थान हाई कोर्ट दोनों ने माना है कि कई मामलों में परिवार की असहमति या सामाजिक दवाव के चलते पॉक्सो का सहारा लिया जाता है। भारत में पहले लड़कियों की सहमति की उम्र 16 वर्ष थी। वर्ष 2012 में पॉक्सो लागू होने के बाद इसे 18 वर्ष कर दिया गया। इसके बाद 2013 के आपराधिक कानून संशोधन से 18 वर्ष से कम उम्म्र में सहमति को भी अपराध की श्रेणी में डाल दिया गया।

'रोमियो-जूलियट क्लॉज' क्या है?

यह प्रावधान उन किशोरों और युवाओं को कानूनी सुरक्षा देता है, जो लगभग समान उम्र के हो और जिनका रिश्ता आपसी सहमति पर आधारित हो। ऐसे मामलों को आपराधिक श्रेणी से बाहर रखा जाता है, ताकि किशोर अपराधी न बनें और उनके कॅरिअर व जीवन पर आजीवन दाग न लगे। इसका नाम शेक्सपियर के प्रसिद्ध नाटक 'रोमियो एंड जूलियट' से लिया गया है, जो युवा प्रेम और सामाजिक विरोध की त्रासदी को दर्शाता है। अमेरिका में इसकी शुरुआत हुई, जहां कई राज्यों ने इसे अपनाया है।

17 वर्षीय किशोरी व 19 वर्षीय युवक का मामला

यह टिप्पणी एक वास्तविक मामले की सुनवाई के दौरान आई, जिसमें 17 वर्षीय किशोरी और 19 वर्षीय युवक के बीच सहमति-आधारित संबंध थे। परिवार की असहमति के बाद युवक के खिलाफ पॉक्सो, अपहरण और अन्य धाराओं में एफआईआर दर्ज की गई। सुनवाई में अदालत ने पाया कि संबंध पूरी तरह सहमति से थे और किसी प्रकार का शोषण या दबाव नहीं था। मेडिकल रिपोर्ट में भी यौन उत्पीड़न का कोई प्रमाण नहीं मिला। पीड़िता ने अपने बयानों में बार-बार यौन शोषण से इनकार किया और स्वेच्छा से युवक के साथ जाने की बात स्वीकार की। अदालत ने बीएनएस की धारा 528 के तहत हस्तक्षेप करते हुए एफआईआर, चार्जशीट और सेशन ट्रायल को पूरी तरह रद्द कर दिया। हाई कोर्ट ने टिप्पणी की कि सहमति वाले रिश्तों पर पॉक्सो का यांत्रिक और अंधाधुंध प्रयोग न्याय के मूल सिद्धांतों के विरुद्ध है। यह सामाजिक वास्तविकताओं की अनदेखी करता है और युवाओं के भविष्य को स्थायी नुकसान पहुंचाता है। अदालत ने आगाह किया कि यदि इस प्रवृत्ति पर रोक नहीं लगी, तो कानून संरक्षण की जगह दमन का औजार बन जाएगा।

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