Monday, April, 27,2026

फील्ड में उतरकर जयपुर की दशा-दिशा सुधारने में जुटे नए अफसर, जमीन पर दिखने लगा असर

जयपुर: लोग उम्मीद कर रहे हैं कि अब राजधानी जयपुर के 'अच्छे दिन' आ गए हैं। स्वतः ही ऐसा सुखद संयोग बना है कि 'अच्छे दिनों' की जिम्मेदारी अफसरों की एक ऐसी नई टीम के कंधों पर है, जिनकी योग्यता, कार्यकुशलता और कर्मठता को देखते हुए उनसे काफी उम्मीदें और अपेक्षाएं की जा सकती हैं।

संयोग यह कि जेडीसी सिद्धार्थ महाजन, कलेक्टर संदेश नायक और नगर निगम के सीईओ ओम कसेरा तीनों की लगभग एक साथ नई पोस्टिंग हुई है। पूर्व में ऐसा संयोग कभी नहीं बना। तीनों ने ही नई जिम्मेदारी संभालने के साथ जिस तरह फील्ड में उतरकर इस शहर की दशा-दिशा सुधारने में दिलचस्पी ली है, उससे 'पूत के पांव पालने' में नजर आने लगे हैं।


2003 बैच के सिद्धार्थ महाजन राजस्थान कैडर के आईएएस अधिकारी हैं और अपनी ईमानदारी व सादगीपूर्ण कार्यशैली के लिए जाने जाते हैं। उन्हें नेडीसी जैसे हाई-प्रोफाइल पद की जिम्मेदारी सौंपी गई है। यह राज्य की राजधानी में सबसे अधिक चाही जाने वाली और अहम जिम्मेदारियों में से एक है। सत्ता के गलियारों में हर कोई भली-भांति जानता है कि जेडीसी का काम करने का तरीका और नतीजों पर उनका जोर, आम आदमी तक सरकारी सेवाओं को पहुंचाने की व्यवस्था में अहम भूमिका निभाता है। काम से जुड़ी कई चुनौतियों जैसे राजस्व संग्रह, ऑनलाइन सिस्टम का सुचारु संचालन, लंबित पट्टे जारी करना और सैकड़ों अन्य महत्वपूर्ण मामलों को निपटाने के अलावा कमिश्नर को स्थानीय राजनीतिक दबाव के बीच संतुलन और समन्वय बनाते हुए योग्यता के आधार पर कार्य करना होता है। सिद्धार्थ इन सभी पैमानों पर खरे उतरते हैं, लेकिन अभी भी उन्हें एक लंबा सफर तय करना है।

कई विकल्पों में से जयपुर कलेक्टर के लिए संदेश नायक का चयन इस मायने में अच्छी बात है कि 2011 बैच के ये युवा आईएएस सरकार के भरोसे के अफसर हैं। सीएमओ में ढाई साल का कार्यानुभव और सरकार का भरोसा जयपुर को 'अच्छा' बनाने में उपयोगी साबित होगा। राजधानी जैसे संवेदनशील और अति महत्वपूर्ण शहर में संदेश नायक की पोस्टिंग का साफ संकेत है कि सीएम अपने निर्वाचन वाले शहर में प्रशासनिक कसावट और विकास कार्यों को 'सुपरफास्ट' मोड पर लाना चाहते हैं।
जयपुर शहर संदेश नायक के लिए नया नहीं है। जयपुर स्मार्ट सिटी के सीईओ के रूप में काम कर चुके हैं। शहर की गलियों, ट्रैफिक की समस्याओं, अतिक्रमण और शहरी विकास के प्रोजेक्ट्स से वे अच्छे तरह वाकिफ हैं। तीन
जिलों में कलेक्टरी का उन्हें पर्याप्त अनुभव है।

जयपुर में कलेक्टर की कुर्सी पर बैठने के साथ ही नायक ने जिस तरह फील्ड में उतरकर हैंडपंपों और अन्नपूर्णा रसोइयों की खोज खबर ली, उससे उनकी कार्यशैली का अंदाजा लगाया जा सकता है। यह कार्यशैली शहर को 'अच्छा' बनाने में कारगर होगी। यह भी एक रोचक संयोग है कि जयपुर में नए कलेक्टर के साथ ही 1 अप्रैल को जयपुर नगर निगम में भी नए सीईओ ओम प्रकाश कसेरा ने जिम्मेदारी संभाली है। वे ऐसे समय पर इस कुर्सी पर काबिज हुए हैं, जब निगम में कोई पॉलिटिकल लीडरशिप नहीं है। न कोई चेयरमैन, ना ही कोई पार्षद। वे ही 'सर्वेसर्वा' हैं। फिर अब दो की जगह पूरे शहर का एक ही निगम है। ऐसे में समूचा गुलाबी शहर अब उनका कार्यक्षेत्र है। दो निगमों का झंझट खत्म हो गया है।

खान और बिजली विभागों में रहते हुए कसेरा ने कई बड़े और बोल्ड निर्णय लिए हैं। वे 'फास्ट डिसीजन' लेने वाले अफसर जाने
जाते हैं। जयपुर नगर निगम में उन जैसे ही अफसर की आज जरूरत है। यहां भी 'बड़े फैसलों' से ही बात बनेगी। पदभार संभालने के बाद रात में 10 किलोमीटर तक घूमकर जिस तरह उन्होंने शहर की सफाई व्यवस्था का 'पोस्टमार्टम' किया, उससे उम्मीद जगी है कि अब यह शहर पूर्व की तरह साफ-सुथरा और सुंदर दिखने लगेगा। सीईओ की इस नाइट विजिट का जनता में अच्छा संदेश गया है।

सीईओ ओम कसेरा ने 18 अप्रैल को शहर में मैराथन सफाई अभियान चलाया। वे खुद फील्ड में उतरे और कलेक्टर संदेश नायक को भी साथ में लिया। 14 घंटे चले महाअभियान में छह हजार टन कचरा उठा तो एक बार तो गुलाबी नगर चमकने लगा। कसेरा-नायक ने 'अच्छे दिनों' का नजारा पेश किया। यह सही है कि सिद्धार्थ महाजन, संदेश नायक और ओम कसेरा के समक्ष समस्याओं और चुनौतियों का बड़ा पहाड़ है। नए प्रोजेक्ट्स के जरिए शहर के विकास को गति देने, अधूरे प्रोजेक्ट्स को पूरा करवाने, अवैध निर्माण और अतिक्रमण पर अंकुश, बेहाल हो रही ट्रैफिक व्यवस्था को पटरी पर लाने और गंदे हुए पड़े शहर को साफ व सुंदर बनाने की चुनौतियां प्रमुख हैं।

जयपुर के नागरिकों के लिए मेट्रो के दूसरे फेज को मंजूरी की सौगात 'अच्छे दिनों' वाली खुशखबरी है। अफसरों की नई टीम में दिख रही रुचि, समर्पण और उत्साह ने भविष्य में ऐसे और सकारात्मक विकास की उम्मीदें बढ़ा दी हैं, लेकिन अंततः सभी को परिणाम देना होगा, क्योंकि तीनों स्थानीय स्वशासी संस्थाएं मुख्यमंत्री की कड़ी निगरानी में भी हैं।

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