Wednesday, February, 04,2026

700 करोड़ खर्च फिर भी नहीं मिल रही शुद्ध हवा

जयपुर: राजस्थान में वायु प्रदूषण की समस्या दिन-ब-दिन विकराल रूप लेती जा रही है। तेजी से हो रहा शहरीकरण, बढ़ती वाहनों की संख्या, निर्माण कार्यों से उड़ती धूल, फैक्टरियों से निकलता धुआं और कचरे का अनुचित प्रबंधन ये सभी कारक मिलकर हवा को लगातार जहरीला बना रहे हैं। अंधाधुंध पेड़ों की कटाई ने भी स्थिति को और गंभीर कर दिया है।

इसका असर न केवल पर्यावरण पर पड़ रहा है, बल्कि आमजन की सेहत पर भी गंभीर खतरा मंडरा रहा है। केंद्र सरकार के एनसीएपी के तहत करोड़ों रुपए खर्च किए जा चुके हैं, लेकिन कई इलाकों में वायु गुणवत्ता अब भी 'खराब' या 'बहुत खराब' श्रेणी में बनी हुई है। विभाग के बड़े-बड़े दावों के बावजूद जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है। जोधपुर से लेकर जयपुर तक जहरीली हवा का कहर जारी है। वर्ष की शुरुआत से ही जयपुर लंबे समय तक 'रेड जोन' में बना रहा। इसके बावजूद विभाग अलग-अलग दावे करता नजर आ रहा है।

जयपुर में 344.70 करोड़ रुपए खर्च

राजस्थान राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार केंद्र और राज्य सरकार ने एनसीएपी के तहत राजस्थान के पांच प्रमुख शहर जयपुर, जोधपुर, कोटा, अलवर और उदयपुर को चुना है। इन शहरों में वायु गुणवत्ता सुधारने के लिए कुल 700 करोड़ रुपए से अधिक की राशि स्वीकृत की गई है। यह राशि सड़क सफाई, धूल नियंत्रण और प्रदूषण मॉनिटरिंग जैसी योजनाओं पर खर्च की गई है। जयपुर में 344.70 करोड़ रुपए खर्च हो चुके हैं, इसके बावजूद सर्दियों में एयर क्वालिटी इंडेक्स (एक्यूआई) अक्सर 'खराब' श्रेणी में पहुंच जाता है। जोधपुर में 153.49 करोड़ रुपए स्वीकृत किए गए, जिनमें से करीब
111 करोड़ रुपए खर्च हो चुके हैं। यहां पीएम-10 स्तर में 33 प्रतिशत से अधिक की कमी दर्ज की गई है, लेकिन स्वास्थ्य पर खतरा अब भी बरकरार है। कोटा में 135.72 करोड़ रुपए के बजट में से बड़ा हिस्सा उपयोग किया जा चुका है, जिसमें औद्योगिक उत्सर्जन नियंत्रण पर विशेष ध्यान दिया गया।

अलवर और उदयपुर में भी बड़े बजट का उपयोग स्मॉग नियंत्रण और ग्रीन बेल्ट विकसित करने में किया गया। अलवर में पीएम-10 में 29 प्रतिशत और जयपुर में 17 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है। सरकार का दावा है कि इन प्रयासों से कुछ सुधार हुआ है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि यह प्रगति नाकाफी है।

भिवाड़ी से श्रीगंगानगर तक 'रेड जोन'

प्रदेश के कुछ जिले प्रदूषण के मामले में देश के सबसे खराब क्षेत्रों में शुमार हो चुके हैं। यहां की हवा न केवल जहरीली है, बल्कि स्वास्थ्य के लिए भी बेहद घातक साबित हो रही है। भिवाड़ी को राज्य का सबसे प्रदूषित इलाका माना जाता है। यहां फैक्टरियों के धुएं और उड़ती धूल के कारण एक्यूआई अक्सर 300 के पार चला जाता है। यह इलाका लगातार 'रेड जोन' में बना रहता है, जहां सांस लेना तक मुश्किल हो जाता है। श्रीगंगानगर में पीएम-10 का स्तर बेहद ऊंचा रहता है और एक्यूआई कई बार 'गंभीर' श्रेणी तक पहुंच जाता है। जयपुर में भी सर्दियों के दौरान हवा 'खराब' हो जाती है। बढ़ता ट्रैफिक और निर्माण स्थलों से उठती धूल स्थिति को और बिगाड़ देती है। NCAP के बावजूद यहां सुधार सीमित ही नजर आता है। इन इलाकों में प्रदूषण का स्तर इतना अधिक है कि लोगों को सांस संबंधी बीमारियों का सामना करना पड रहा है।

सुविधाओं के लिए 14.72 करोड़ रुपए स्वीकृत

प्रदूषण से निपटने के लिए राज्य सरकार ने 2025-26 के बजट में अतिरिक्त प्रावधान किए हैं। एनसीएपी और एनसीआर के अंतर्गत आने वाले शहरों में एंटी-स्मॉग गन, स्मॉग टावर और मैकेनिकल रोड स्वीपर जैसी सुविधाओं के लिए 14.72 करोड़ रुपए मंजूर किए गए हैं। वहीं, पूरे राज्य के 54 शहरों में वॉटर स्प्रिंकलर और स्वीपर मशीनों के लिए 15.93 करोड़ रुपए का बजट रखा गया है। इसके अलावा प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा नियमित जांच की जा रही है। सड़कों की सफाई, निर्माण स्थलों पर धूल नियंत्रण के निर्देश दिए जा रहे हैं और नियमों का उल्लंघन करने वाली फैक्टरियों पर जुर्माना लगाया गया है या उन्हें बंद करने के आदेश जारी किए गए हैं।

 

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