Tuesday, May, 05,2026

बंगाल में भाजपा का 'खेला'

नई दिल्ली: पश्चिम बंगाल में इस बार का चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन का संकेत नहीं, बल्कि शीर्ष नेतृत्व की रणनीति, समन्वय और जमीनों क्रियान्वयन की सफलता का उदाहरण बनकर उभरा है। लंबे समय से सत्तारूढ़ व्यवस्था के खिलाफ माहौल, कानून-व्यवस्था पर उठते सवाल और विभिन्न घटनाओं के बीच भाजपा ने अपने नेताओं के जरिए चुनावी लड़ाई को संगठित रूप दिया। इस जीत के केंद्र में पार्टी के प्रमुख रणनीतिकार सुनील बंसल और चुनाव प्रभारी भूपेंद्र यादव रहे, जिन्होंने पूरे अभियान को माइक्रो स्तर तक मैनेज किया। इनके साथ सह प्रभारी बिप्लब कुमार देब ने जमीनी ढांचे को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। तीनों नेताओं के तालमेल ने चुनावी अभियान को एक सुव्यवस्थित तंत्र में बदल दिया, जहां हर स्तर पर स्पष्ट जिम्मेदारियां तय थीं। हर चुनाव में एक नारा होता है, लेकिन बंगाल में यह नारा एक भावना बन गया 'बाचते चाई, बीजेपी ताई'। यह संदेश लोगों के बीच तेजी से फैल गया। बताया जा रहा है कि बच्चे-बच्चे की जुबान पर चढ़ा यह नारा चुनावी माहौल को बदलने में अहम साबित हुआ।

मोदी-शाह की जोड़ी का प्रभाव

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह की जोड़ी ने चुनावी माहौल को राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य दिया। उनकी रैलियों और बयानों ने कार्यकर्ताओं में उत्साह भरा और मतदाताओं के बीच भाजपा का संदेश व्यापक स्तर पर पहुंचाया। अवैध घुसपैठ और विकास जैसे मुद्दों को प्रमुखता से उठाकर उन्होंने चुनावी दिशा को प्रभावित किया। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने चाणक्य की भूमिका निभाई। शाह ने केंद्र में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद अब तक का सबसे आजनमक चुनाव प्रचार किया। उन्होंने टीएमसी के शासन की आलोचना करने के लिए टीएमसी के गुंडों को उलटा लटकाकर ठीक करने का बयान देने से भी परहेज नहीं किया। शाह ने पूरी तरह से चुनाव अभियान को लीड किया।

बिप्लब देबः जमीनी विस्तार के सूत्रधार

सह प्रभारी विप्लब कुमार देब ने पूर्वोत्तर के अपने अनुभव का उपयोग करते हुए बंगाल में संगठन के विस्तार को गति दी। उन्होंने स्थानीय स्तर पर कार्यकर्ताओं को सक्रिय किया और अभियान को तेजी से आगे बढ़ाया।

सुवेंदु अधिकारी

बंगाल विधानसभा में विपक्ष के नेता होने के नाते सुर्वेदु अधिकारी ने सीचे ममता से टक्कर ली। नंदीग्राम में हराने के बाद वह ममता के गढ़ भवानीपुर लड़ने चले गए। ऐसा करके उन्होंने ममता बनर्जी को भवानीपुर में ध्यान केंद्रित करने के लिए मजबूर कर दिया। अमित शाह की हर रणनीति को सुवेंदु अधिकारी ने प्रदेश प्रमुख समिक भट्टाचार्य के साथ मिलकर जमीन पर उतारा। सुर्वेदु अधिकारी ने जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं को जोड़ने और टीएमसी के खिलाफ मोर्चा संभालने में केंद्रीय भूमिका निभाई। सुवेदु अधिकारी बंगाल के नए सीएम के प्रबल दावेदार हैं। शाह इस संबंध में पहले ही संकेत दे चुके हैं।

सुनील बंसलः संगठन की रीढ़

सुनील बंसल ने बूथ स्तर तक संगठन को मजबूत करने पर विशेष ध्यान दिया। उनका फोकस कार्यकर्ताओं के नेटवर्क को सक्रिय करने और हर बूथ पर पार्टी की उपस्थिति सुनिश्चित करने पर रहा। यही कारण रहा कि भाजपा गांव-गांव और मोहल्ले मोहल्ले तक अपनी पकड़ बना सकी।

भूपेंद्र यादवः रणनीति के शिल्पकार

भूपेंद्र यादव ने पूरे चुनावी अभियान को व्यापक दिशा दी। उन्होंने चुनावी मुद्दों, संदेश और प्रचार की रूपरेखा इस तरह तैयार की कि वह सीधे मतदाताओं से जुड़ सके। घुसपैठ, कानून-व्यवस्था और विकास जैसे मुद्दों को प्रभावी ढंग से सामने रखा गया।

सुकांत मजूमदार

बंगाल बीजेपी के अध्यक्ष के बाद केंद्रीय मंत्री बने सुकांत मजूमदार राज्य के बड़े बीजेपी नेता है। उन्होंने दिलीप घोष, सुर्वेदु अधिकारी और समिक भट्टाचार्य के बीच न सिर्फ समन्वय रखा बल्कि राज्य में तमाम मुद्दों पर मुखर रहे। संगठनात्मक ढांचे और चुनाव प्रचार की कमान संभाली। वह पूरे चुनाव में अमित शाह की कोर टीम का हिस्सा रहे।

दिलीप घोष

मजबूत आरएसएस बैकग्राउंड रखने वाले दिलीप घोष को बीजेपी ने चुनाव मैदान में उतारा। इसके साथ बीजेपी ने 77 सीटों तक पहुंचाने वाले इस नेता के अनुभव को पूरा इस्तेमाल किया। गृह मंत्री अमित शाह ने दिलीप घोष को इस कोर ग्रुप में रखा। दिलीप घोष भले ही खड़गपुर सदर से चुनाव लड़े हैं लेकिन बीजेपी की सरकार में उन्हें अहम जिम्मेदारी मिलने की पूरी उम्मीद की जा रही है। वे मेदिनीपुर निर्वाचन क्षेत्र से लोकसभा सासद रह चुके हैं और इससे पहले खड़गपुर सदर से विधायक भी रहे है। घोष राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रह चुके है।

नेतृत्व और अभियान का समन्वय

कमल मेला, घर-घर बैठकें, नुक्कड़ सभाएं और जनजागरण अभियान जैसे कार्यक्रमों को सफल बनाने में नेतृत्व की रणनीति और कार्यकर्ताओं की मेहनत का समन्वय साफ दिखाई दिया। नेताओं ने न केवल दिशा तय की, बल्कि हर स्तर पर उसकी निगरानी भी की। कुल मिलाकर, पश्चिम बंगाल में भाजपा की जीत नेताओं की सुनियोजित रणनीति, मजबूत संगठन और प्रभावी क्रियान्वयन का परिणाम है। यह चुनाव इस बात का उदाहरण है कि जब शीर्ष नेतृत्व और जमीनी ढांचा एक साथ काम करते हैं, तो कठिन से कठिन चुनावी चुनौती को भी अवसर में बदला जा सकता है।

स्थानीय नेतृत्व पर भरोसा

इस बार भाजपा ने उम्मीदवार चयन में भी नेताओं की नई पीढ़ी को मौका दिया। डॉक्टर, वकील, खिलाड़ी और स्थानीय चेहरों को टिकट देकर पार्टी ने 'स्थानीय बनाम बाहरी की बहस को कमजोर किया। इससे मतदाताओं में विश्वास बढ़ा और संगठन को मजबूती मिली।

 

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