Tuesday, July, 14,2026

डॉक्टरों ने मंत्री के सामने गिनाईं स्वास्थ्य तंत्र की कमजोरियां

जयपुर: सरकारी अस्पतालों में हाल के दिनों में प्रसूताओं की लगातार हो रही मौतों ने स्वास्थ्य विभाग की चिंता बढ़ा दी है। स्वास्थ्य भवन में सोमवार को चिकित्सा मंत्री गजेन्द्र सिंह खींवसर की अध्यक्षता में करीब ढाई घंटे तक चली उच्च स्तरीय समीक्षा बैठक में प्रदेश के वरिष्ठ गायनेकोलॉजिस्ट, मेडिकल कॉलेजों के प्राचार्य, अस्पताल अधीक्षक और स्वास्थ्य विभाग के शीर्ष अधिकारियों ने मातृ मृत्यु के मामलों पर विस्तार से मंथन किया। हालांकि बैठक के बाद भी सरकार इन मौतों के पीछे किसी एक समान कारण (रूट कॉज) तक नहीं पहुंच सकी। बैठक से पहले मीडिया से बातचीत में खींवसर ने स्वीकार किया कि विभाग ने हर स्तर पर जांच करवा ली है, लेकिन अभी तक यह स्पष्ट नहीं हो पाया कि कम समय में अलग-अलग स्थानों पर एक साथ मौतें क्यों हुई। उन्होंने कहा कि वह पहले भीलवाड़ा और फिर बांसवाड़ा जाकर व्यवस्थाओं की समीक्षा करेंगे। इसके बाद हर मातृ मृत्यु की अलग-अलग केस स्टडी सार्वजनिक की जाएगी। उन्होंने कहा कि दो दिन बांसवाड़ा जाकर आने दीजिए। एक-एक केस की स्टडी करेंगे और हर सवाल का कारण सहित जवाब देंगे। पिछले वर्षों में मातृ मृत्यु दर लगातार घटी है, लेकिन हाल की घटनाओं की गहन जांच कराई जाएगी।

बैठक में वरिष्ठ गायनेकोलॉजिस्ट ने माना कि अधिकांश मामलों में प्रसूताएं गंभीर स्थिति में रेफर होकर अस्पताल पहुंचीं, जिनमें एनीमिया, हाई ब्लड प्रेशर, पीपीएच, किडनी फेलियर, डिहाइड्रेशन और बिगड़े हुए रेफरल केस प्रमुख कारण रहे। मंत्री ने बताया कि वे बांसवाड़ा जाकर स्वयं व्यवस्थाओं की समीक्षा करेंगे और लौटने के बाद प्रत्येक मौत की केस स्टडी सार्वजनिक करेंगे। हालांकि बैठक के दौरान विशेषज्ञों ने मंत्री के सामने कहा कि छोटे अस्पतालों में विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी, समय पर एम्बुलेंस नहीं मिलना, गंभीर मरीजों का देर से रेफर होना और प्राथमिक स्तर पर गर्भवती महिलाओं की पर्याप्त निगरानी नहीं होना भी प्रमुख समस्या है।

'परचून दुकान से गर्भपात दवा खरीद लेती हैं महिलाएं'

बैठक में कोटा के जेके लोन अस्पताल की अधीक्षक एवं गायनेकोलॉजी विभागाध्यक्ष डॉ. निर्मला शर्मा ने मंत्री के सामने गंभीर चिंता जताते हुए कहा कि कई महिलाएं बिना चिकित्सकीय सलाह के परचून की दुकानों से गर्भपात की दवाएं खरीदकर सेवन कर लेती हैं। इससे अत्यधिक रक्तस्राव होने के बाद वे अंतिम अवस्था में अस्पताल पहुंचती है। ऐसे मामलों में पर्याप्त फ्लूड और ब्लड चढ़ाने के बावजूद कई बार मरीज को बचाना संभव नहीं हो पाता। उन्होंने बताया कि कोटा के दो बड़े सरकारी अस्पतालों में हर वर्ष 17 से 18 हजार प्रसव होते हैं। पहले जहां लगभग 60 मातृ मृत्यु होती थी, वहीं अब पिछले छह महीने में केवल सात मौतें हुई है। उन्होंने कहा कि अस्पताल में आने वाली लगभग हर गर्भावस्था हाई रिस्क होती है और हाई रिस्क प्रेग्नेंसी को किसी 'रिमोट कंट्रोल' से नियंत्रित नहीं किया जा सकता। एनीमिया, हाईपरटेशन, हाई रिस्क डिलीवरी, डिहाइड्रेशन, लो ब्लड प्रेशर और बिगड़े हुए रेफरल केस मातृ मृत्यु के प्रमुख कारण हैं। इसलिए घर से ही डेथ का कारण चला आता है।

दो वर्षों में 25 प्रतिशत घटी मातृ मृत्यु

बैठक में प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2023-24 में प्रदेश में 1094 मातृ मृत्यु दर्ज हुई थी, जो वर्ष 2024-25 में घटकर 986 और वर्ष 2025-26 में 824 रह गई। पिछले दो वर्षों में मातृ मृत्यु में लगभग 25 प्रतिशत की कमी आई है। खीवसर ने कहा कि सभी मामलों के कारण अलग-अलग हैं। उन्होंने अस्पतालों में संक्रमण रोकने, एएनसी मॉनिटरिंग मजबूत करने, रेफरल सिस्टम सुधारने, आशा कार्यकर्ताओं और एएनएम की निगरानी बढ़ाने तथा विशेषज्ञ चिकित्सकों को फील्ड में जाकर व्यवस्थाओं का मूल्यांकन करने के निर्देश दिए। बैठक में विशेषज्ञों ने लेबर रूम की क्षमता बढ़ाने, रेफरल ऑडिट, एनीमिया की समय पर पहचान और उपचार, ऑपरेशन पूर्व ईसीजी, प्रसव पूर्व जांच की नियमित मॉनिटरिंग तथा अस्पतालों में प्रोटोकॉल के सख्त पालन जैसे कई महत्वपूर्ण सुझाव भी सरकार को दिए।

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