Tuesday, July, 14,2026

भीलवाड़ा और बांसवाड़ा के बाद अलर्ट, विशेषज्ञ टीम करेगी जांच

जयपुर: राजस्थान में लगातार सामने आ रहे प्रसूताओं की मौत के मामलों ने प्रदेश की मातृ स्वास्थ्य सेवाओं पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। भीलवाड़ा और बांसवाड़ा में कुछ ही दिनों के भीतर कई महिलाओं की मौत के बाद चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग पूरी तरह एक्शन मोड में आ गया है। सरकार ने स्पष्ट किया है कि इन घटनाओं की केवल औपचारिक जांच नहीं होगी, बल्कि मौत की वास्तविक वजह तक पहुंचने के लिए विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम हर पहलू की गहन पड़ताल करेगी। साथ ही पूरे प्रदेश में मातृ स्वास्थ्य सेवाओं और सिजेरियन ऑपरेशन से जुड़े प्रोटोकॉल की समीक्षा भी की जाएगी।

सबसे अधिक चर्चा भीलवाड़ा के महात्मा गांधी अस्पताल के मातृ एवं शिशु चिकित्सालय (एमसीएच) की हो रही है, जहां छह दिन के भीतर पांच प्रसूताओं की मौत ने स्वास्थ्य व्यवस्था को कठघरे में खड़ा कर दिया। शुरुआती स्तर पर ऑपरेशन थिएटर (ओटी) में संक्रमण की आशंका जताई गई थी, लेकिन स्वास्थ्य विभाग का कहना है कि अब तक की जांच में संक्रमण की पुष्टि नहीं हुई है। इसके बावजूद सरकार ने साफ किया है कि शुरुआती रिपोर्ट को अंतिम निष्कर्ष नहीं माना जाएगा और विशेषज्ञ टीम सभी मेडिकल रिकॉर्ड, उपचार प्रक्रिया, ऑपरेशन प्रोटोकॉल तथा अस्पताल को व्यवस्थाओं की बारीकी से जांच करेगी।

लापरवाही नहीं मिली, लेकिन जांच जारी

चिकित्सा एवं स्वास्थ्य मंत्री गजेंद्र सिंह खींवसर ने कहा कि प्रदेश में प्रत्येक मातृ मृत्यु अत्यंत संवेदनशील विषय है और सरकार हर घटना की गंभीरता से समीक्षा कर रही है। उनके अनुसार अभी तक उपलब्ध तथ्यों में चिकित्सकीय लापरवाही का कोई स्पष्ट प्रमाण सामने नहीं आया है। हालांकि यदि जांच में किसी स्तर पर प्रोटोकॉल उल्लंघन या लापरवाही सिद्ध होती है तो संबंधित के खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने बताया कि प्रदेश में मातृ मृत्यु दर (एमएमआर) घटकर 87 प्रति एक लाख जीवित जन्म हो गई है, जो पिछले वर्षों की तुलना में लगभग 15 अंकों की कमी दर्शाती है। संस्थागत प्रसव का प्रतिशत बढ़कर 94.1 प्रतिशत हो गया है, जो राष्ट्रीय औसत से लगभग चार प्रतिशत अधिक है।

केंद्रीय टीम राजस्थान भेजने की मांग

पूर्व सीएम अशोक गहलोत ने कहा है कि प्रदेश में प्रसूताओं की मौतों की बढ़ती संख्या बेहद डरावनी, स्तब्ध करने वाली और जन स्वास्थ्य सेवा के गहराते संकट की पुष्टि कर रही है। अब बांसवाड़ा में प्रसूताओं की मौत के बाद दो माह में 18 मौतों की खबर है। सरकार की ओर से कोई जवाबदेही नहीं होना स्थिति को और गंभीर बना रहा है। इस संकट को संभालना, प्रसूताओं की जान बचाना और स्वास्थ्य प्रणाली में विश्वास को वापस लौटाना इस सरकार के बस से बाहर हो चुका है। इस सरकार की असंवेदनशीलता और गैर जवाबदेही इस संकट को बढ़ा रही है। मैंने केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की टीम को राजस्थान भेजने की मांग की थी, केंद्र सरकार को इस हालात पर गंभीरता से विचार कर तुरंत सुधारात्मक कदम लेने होंगे वरना न जाने और कितनी प्रसूताएं दम तोड़ देंगी।

चिकित्सा मंत्री कल करेंगे निरीक्षण

चिकित्सा एवं स्वास्थ्य मंत्री गजेंद्र सिंह खींवसर मंगलवार को भीलवाड़ा पहुंचकर अस्पताल का निरीक्षण करेंगे। वे जांच टीमों से रिपोर्ट लेंगे और पूरे घटनाक्रम की समीक्षा करेंगे। सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि यदि जांच में किसी भी स्तर पर लापरवाही या प्रोटोकॉल उल्लंघन सामने आता है तो संबंधित अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होगी।

गायनिक विशेषज्ञों की बैठक आज

इन घटनाओं के बाद सोमवार को प्रदेशभर के वरिष्ठ गायनिक विशेषज्ञों की बैठक बुलाई गई है। बैठक में भीलवाड़ा और बांसवाड़ा के मामलों की समीक्षा के साथ यह भी तय किया जाएगा कि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए स्वास्थ्य सेवाओं में कौन-कौन से सुधार जरूरी हैं। सरकार का कहना है कि उद्देश्य केवल दोष तय करना नहीं, बल्कि मातृ स्वास्थ्य सेवाओं को अधिक सुरक्षित और प्रभावी बनाना है।

पांच जिलों में सामने आ चुके मामले

भीलवाड़ा के महात्मा गांधी अस्पताल के एमसीएच में 5 से 10 जुलाई के बीच छह दिन में संगीता जीनगर, शिमला गुर्जर, फोरी देवी, ईशा पांडे और दिव्या की मौत हो गई। सभी महिलाओं का सिजेरियन ऑपरेशन हुआ था। ऑपरेशन के बाद उनकी तबीयत बिगड़ी और उन्हें मेडिकल आईसीयू में भर्ती कराया गया, जहां उपचार के दौरान उनकी मौत हो गई। हर मामले में परिजनों ने इलाज में लापरवाही के आरोप लगाए हैं। दावा है कि मार्च से अब तक इसी अस्पताल में प्रसूताओं की मौत का आंकड़ा नौ तक पहुंच चुका है, जबकि इनमें से पांच मौतें केवल जुलाई के पहले 11 दिनों में हुई हैं। यह आंकड़ा स्वास्थ्य विभाग के लिए गंभीर चिंता का विषय बन गया है।

भीलवाड़ा के समान ही बांसवाड़ा के महात्मा गांधी चिकित्सालय में भी 7 से 10 जुलाई के बीच एक नाबालिग सहित चार प्रसूताओं की मौत हुई। मामला केवल भीलवाड़ा और बांसवाड़ा तक सीमित नहीं है। इससे पहले कोटा के न्यू मेडिकल कॉलेज में मई माह में सिजेरियन के बाद पांच प्रसूताओं की किडनी फेल होने से मौत हुई थी। जून में बीकानेर के पीबीएम अस्पताल में भी सिजेरियन के बाद दो प्रसूताओं की मौत और कई महिलाओं की तबीयत बिगड़ने के मामले सामने आए। जोधपुर के पावटा जिला अस्पताल में भी कई प्रसूताओं की हालत बिगड़ने की घटनाएं हुई, जबकि जयपुर में आमेर सैटेलाइट अस्पताल से रेफर की गई एक महिला की भी एसएमएस अस्पताल में मौत हो चुकी है।

लगातार अलग-अलग जिलों से सामने आ रहे इन मामलों ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या प्रदेश के सरकारी अस्पतालों में सिजेरियन के बाद संक्रमण नियंत्रण, पोस्ट ऑपरेटिव मॉनिटरिंग और गंभीर मरीजों के प्रबंधन की व्यवस्था में कहीं न कहीं ऐसी कमियां हैं, जिनकी व्यापक समीक्षा की आवश्यकता है। अब विशेषज्ञ समितियों की रिपोर्ट पर पूरे प्रदेश की नजर है। यदि जांच में किसी प्रणालीगत खामी का खुलासा होता है तो सरकार के सामने केवल जिम्मेदारी तय करने का ही नहीं, बल्कि मातृ स्वास्थ्य सेवाओं में व्यापक सुधार लागू करने की भी बड़ी चुनौती होगी।

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