Thursday, January, 29,2026

स्पीकर के जांच समिति गठित करने के संबंध में रोक नहीं: SC

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कहा कि न्यायाधीश जांच अधिनियम के तहत लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला पर इलाहाबाद हाई कोर्ट के न्यायाधीश यशवंत वर्मा के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच के लिए जांच समिति गठित करने पर कोई रोक नहीं है।

प्रथम दृष्टया राय व्यक्त करते हुए, न्यायाधीश दीपांकर दत्ता और न्यायाधीश सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने न्यायाधीश वर्मा का प्रतिनिधित्व कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी की इस दलील से असहमति जताई कि राज्यसभा सभापति पद से जगदीप धनखड़ के इस्तीफे के बाद, उपसभापति को न्यायाधीश को पद से हटाने के लिए प्रस्ताव लाने के संबंध में सौंप गए नोटिस को खारिज करने का अधिकार नहीं है। हालांकि, शीर्ष अदालत ने अपनी मौखिक टिप्पणी में कहा कि लोकसभा अध्यक्ष द्वारा समिति के गठन के तरीके में 'कुछ खामियां' प्रतीत हो रही हैं। वह इसकी पड़ताल करेगा कि क्या यह खामी कार्यवाही को समाप्त करने के लिए पर्याप्त है।

रोहतगी ने शुरुआत में, अध्याक्ष द्वारा जांच समिति के गठन का विरोध करते हुए कहा कि यदि लोकसभा और राज्यसभा में न्यायाधीश के मामले में नोटिस एक ही दिन एक साथ पेश किए जाते हैं, तो समिति का गठन दोनों सदनों द्वारा संयुक्त रूप से किया जाना चाहिए। पीठ न्यायाधीश वर्मा की उस याचिका पर सुनवाई कर रही है, जिसमें उन्होंने न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 के तहत उनके आवास पर अधजले नोट बरामद होने के संबंध में उनके खिलाफ जांच के लिए गठित संसदीय समिति की वैधता को चुनौती दी थी। पीठ ने कहा कि अधिनियम में स्पष्ट रूप से यह नहीं लिखा है कि यदि एक सदन नोटिस को अस्वीकार कर देता है, तो दूसरा सदन कार्यवाही करने से वंचित हो जाता है।

रोहतगी ने उठाए ये सवाल

रोहतगी ने राज्यसभा के उपसभापति द्वारा प्रस्ताव संबंधी नोटिस को खारिज करने के फैसले की भी आलोचना की, जिसे पहले उच्च सदन के सभापति ने स्वीकार कर लिया था। रोहतगी ने कहा कि सवाल यह है कि क्या लोकसभा अध्यक्ष एकतरफा तरीके से जांच समिति का गठन कर सकते हैं जबकि दोनों सदनों में, एक ही दिन पद से हटाने संबंधी प्रस्ताव के नोटिस पेश किए गए थे, लेकिन उन्हें केवल एक सदन में ही स्वीकार किया गया। उन्होंने कहा कि किसी न्यायाधीश को पद से हटाने के लिए संसद को अधिनियम के तहत निर्धारित प्रक्रिया का सख्ती से पालन करना चाहिए, जिसके लिए लोकसभा के कम से कम 100 सदस्यों या राज्यसभा के 50 सदस्यों द्वारा हस्ताक्षरित नोटिस की आवश्यकता होती है।

जस्टिस दत्ता ने पूछा- समिति गठित पर रोक कहां?

न्यायाधीश दत्ता ने सवाल किया कि राज्यसभा द्वारा नोटिस अस्वीकार किए जाने की स्थिति में लोकसभा द्वारा समिति गठित करने पर रोक कहां है? उन्होंने पूछा कि यदि एक सदन ने नोटिस को खारिज कर दिया है, तो लोकसभा द्वारा समिति के गठन पर रोक कहां है? न्यायाधीश दत्ता ने कहा कि प्रावधान में इस बात का उल्लेख नहीं है कि राज्यसभा में प्रस्ताव संबंधी नोटिस की अस्वीकृति लोकसभा को उस पर आगे बढ़ने से रोकेगी या नहीं। उन्होंने कहा, हमें प्रावधान में इसे उद्देश्यपूर्ण ढंग से समझना होगा। हालाकि, पीठ ने कहा कि यदि राज्यसभा ने भी नोटिस स्वीकार कर लिया होता, तो न्यायाधीश वर्मा को संयुक्त समिति का लाभ मिल जाता। इसके साथ ही पीठ ने याचिका पर आगे की सुनवाई गुरुवार के लिए तय कर दी।

यह कहा सुप्रीम कोर्ट ने

  • अधिनियम में स्पष्ट रूप से यह नहीं लिखा है कि यदि एक सदन नोटिस को अस्वीकार कर देता है, तो दूसरा सदन कार्यवाही करने से वंचित हो जाता है।
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