Tuesday, July, 14,2026

सीमावती क्षेत्र में सुरक्षा सर्वोच्च, व्यक्तिगत हित नहीं

जोधपुर/जयपुर: राजस्थान हाई कोर्ट ने भारत-पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय सीमा से सटे क्षेत्रों में अनाधिकृत निर्माणों के खिलाफ प्रशासन की कार्रवाई को वैध ठहराते हुए महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। जस्टिस समीर जैन की एकलपीठ ने सीमावर्ती क्षेत्रों में अवैध निर्माण हटाने के खिलाफ दायर सभी याचिकाओं को निराधार मानते हुए खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों में सरकार का अधिकार सर्वोपरि है और सीमावर्ती क्षेत्रों में व्यक्तिगत हितों से अधिक महत्व देश की सुरक्षा का है। नेशनल सिक्योरिटी से जुड़े इस संवेदनशील मामले की सुनवाई बंद कमरे में हुई। सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल भरत व्यास ने पक्ष रखते हुए कहा कि याचिकाएं केवल नोटिस के खिलाफ और समय से पहले दायर की गई हैं। उन्होंने अदालत को बताया कि मामला राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा है, जिसमें सीमा क्षेत्र की सरकारी भूमि
पर अवैध निर्माण किए गए हैं। कई मामलों में निजी भूमि पर किए गए निर्माण भी वैधानिक प्रावधानों के अनुरूप नहीं हैं। संबंधित पक्षों को सुनवाई का पूरा अवसर दिया गया था और ऐसे मामलों में राष्ट्र की सुरक्षा सर्वोपरि है।

जिला स्तर पर कलेक्टर, एसपी और बीएसएफ प्रतिनिधि की समिति करेगी जांच

हाई कोर्ट ने सीमावर्ती जिलों में जिला कलेक्टर, पुलिस अधीक्षक (एसपी) और सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) के प्रतिनिधि की संयुक्त समिति गठित करने के निर्देश दिए हैं। यह समिति सीमा क्षेत्र में स्थित प्रत्येक संपत्ति और निर्माण की अलग-अलग जांच करेगी। समिति राष्ट्रीय सुरक्षा, भूमि स्वामित्व, वैध अनुमतियों, कब्जे और अन्य संबंधित तथ्यों की जांच कर रिपोर्ट देगी, जिसके आधार पर अवैध निर्माणों को हटाने की कार्रवाई की जाएगी।

हर संपत्ति की अलग होगी जांच

अदालत ने कहा कि सीमा क्षेत्र में स्थित प्रत्येक संपत्ति की परिस्थितियां अलग-अलग हैं, इसलिए सभी मामलों में एक जैसा निर्णय नहीं किया जा सकता। जिन मामलों में भूमि के स्वामित्व, कब्जे, निर्माण की वैधता और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े प्रश्न हैं, उनकी जांच सक्षम प्राधिकारी की ओर से की जानी आवश्यक है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सक्षम प्राधिकारी कानून के अनुसार अंतिम निर्णय लेगा।

केवल नोटिस के आधार पर राहत नहीं

हाई कोर्ट ने माना कि संबंधित पक्षों को कारण बताओ नोटिस जारी किए गए थे और उन्हें अपना पक्ष रखने का पर्याप्त अवसर भी दिया गया था। ऐसे में केवल नोटिस मिलने या न मिलने के आधार पर राहत नहीं दी जा सकती। अदालत ने कहा कि संबंधित पक्षों को पहले वैधानिक प्रक्रिया अपनानी चाहिए थी, सीधे रिट याचिका दायर करना उचित नहीं था।

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