Thursday, January, 29,2026

आज सच को झूठ से अलग करना मुश्किल हो गया

श्रीगंगानगर: टॉटिया विश्वविद्यालय के विधि संकाय में संविधान एवं मानवाधिकार विषयक दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन सम्पन्न हुआ। उद्घाटन सत्र में राजस्थान उच्च न्यायालय, जोधपुर के न्यायाधीश चन्द्रशेखर शर्मा ने कहा कि आज सत्य और असत्य का अंतर धुंधला होता जा रहा है। झूठ इस तरह सच में घुल-मिल गया है कि पहचानना कठिन हो गया है। उन्होंने कहा कि व्यक्ति की सोच ही उसके भविष्य का निर्धारण करती है, इसलिए सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है। न्यायाधीश शर्मा ने यह भी कहा कि संविधान में दिए अधिकारों की चर्चा तो सभी करते हैं, लेकिन कर्तव्यों की बात आते ही, लोग उदासीन हो जाते हैं। इससे पहले वाइस चेयरपर्सन डॉ. मोहित टांटिया, कार्यकारी निदेशक डॉ. के.एस. सुखदेव, निदेशक (शोध एवं अकादमिक) डॉ. प्रवीण शर्मा और समूह के महाप्रबंधक डॉ. विकास सचदेवा ने अतिथियों का स्वागत किया। विशिष्ट अतिथि के रूप में चूरू राजकीय विधि महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो. एस.के. सैनी ने सम्मेलन के विषय को समय की मांग बताया। उन्होंने कहा कि इक्कीसवीं सदी में मानवाधिकार और संविधान पर विमर्श पहले से अधिक आवश्यक हो गया है।

न्यायपालिका संविधान की सच्ची संरक्षक

राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर में विधि संकाय के पूर्व प्राचार्य डॉ. राजीव सोनी ने न्याय की अवधारणा पर प्रकाश डालते हुए कहा कि लोकतंत्र को केवल बहुमत का शासन मान लेना गलत है। लोकतंत्र अंतिम व्यक्ति को अपनी बात कहने का अधिकार देता है। उन्होंने न्यायपालिका को संविधान की सच्ची संरक्षक बताया। कुलपति प्रो. एम. एम. सक्सेना ने मानवाधिकारों के वैश्विक महत्व का उल्लेख करते हुए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के बढ़ते प्रभाव पर भी चर्चा की। इससे पहले न्यायाधीश शर्मा, जिला एवं सत्र न्यायाधीश संजीव मागो और चेयरपर्सन सुनीता टांटिया ने विधि संकाय परिसर में न्याय की देवी की प्रतिमा का अनावरण किया। अधिष्ठाता डॉ. सौरभ गर्ग ने सम्मेलन की रूपरेखा तथा उद्देश्य बताए। आभार सहायक आचार्य डॉ. संदीप कौर ने व्यक्त किया।

एआई के प्रति जागरूकता जरूरी

समापन समारोह के मुख्य अतिथि जेसी बोस यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी, वाईएमसीए, फरीदाबाद के रजिस्ट्रार प्रो. (डॉ.) अजय रांगा ने कहा कि समाज परिवर्तनशील है, इसलिए कानूनों का विकास भी समय के साथ होना अनिवार्य है। उन्होंने कहा कि यदि समाज निष्प्राण हो जाए तो कानून स्वतः अप्रासंगिक हो जाएंगे। कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय की डॉ. मनजिंद्र गुल्यानी ने नई तकनीक पर टिप्पणी करते हुए कहा कि एआई उपयोगी अवश्य है, पर यह मानवीय बुद्धिमत्ता पर भारी पड़ रहा है, इसलिए इसके प्रति जागरूक होना जरूरी है। दिल्ली विश्वविद्यालय की डॉ. कल्पना शर्मा, कुलपति प्रो. सक्सेना और विधि संकाय के अधिष्ठाता डॉ. सौरभ गर्ग ने भी विचार व्यक्त किए।

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