Thursday, January, 29,2026

केंद्र-राज्य के कई वरिष्ठ अधिकारियों से 4 सप्ताह में मांगा जवाब

जयपुर: राजस्थान हाई कोर्ट ने शराब की बोतलों एवं पैकेजिंग पर पिक्टोरियल (सचित्र) स्वास्थ्य चेतावनी अनिवार्य करने के मुद्दे पर कड़ा रुख अपनाया है। कोर्ट ने इस संबंध में दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र एवं राज्य सरकार के कई वरिष्ठ अधिकारियों से चार सप्ताह के भीतर जवाब मांग लिया है।

यह आदेश अवनींद्र मिश्रा की ओर से दायर जनहित याचिका की प्रारंभिक सुनवाई के दौरान पारित किया गया। कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश (एसीजे) संजीव प्रकाश शर्मा और न्यायाधीश संगीता शर्मा की खंडपीठ ने मामले को गंभीर मानते हुए नोटिस जारी किया। कोर्ट ने चिकित्सा एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के सचिव, सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय के सचिव,
खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) के अध्यक्ष, राजस्थान के मुख्य सचिव, प्रमुख सचिव (आबकारी) तथा आयुक्त आबकारी से विस्तृत जवाब तलब किया है।

याचिकाकर्ता ने उठाए गंभीर कानूनी बिंदु

याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता गीतेश जोशी ने अदालत को अवगत कराया कि खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम, 2006 की धारा 16 (5) के तहत पहले से ही मादक पेय पदार्थों के लेबल पर वैधानिक चेतावनी संबंधी प्रावधान हैं। इनमें शराब जैसे उत्पादों पर निर्धारित भाषा में चेतावनी मुद्रित करने का स्पष्ट प्रावधान है। इसके बावजूद वर्तमान में अधिकांश शराब की बोतलों एवं पैकेजिंग पर न तो कोई प्रभावी चेतावनी दी जा रही है और ना ही स्थानीय अथवा क्षेत्रीय भाषाओं में सचित्र स्वास्थ्य चेतावनी (जैसे क्षतिग्रस्त लीवर, कैंसर आदि की तस्वीरें) प्रदर्शित की जा रही हैं। अधिवक्ता ने तर्क दिया कि यह कानूनी प्रावधानों का स्पष्ट उल्लंघन है, जो सार्वजनिक स्वास्थ्य को गंभीर खतरे में डाल रहा है।

पिक्टोरियल वार्निंग अनिवार्य की जाए

'भारत में शराब के अत्यधिक सेवन से लीवर सिरोसिस, विभिन्न प्रकार के कैंसर, हृदय रोग, दुर्घटनाएं और मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं। तंबाकू उत्पादों पर बड़े आकार की सचित्र चेतावनियां अनिवार्य होने के बावजूद शराब पर केवल छोटे टेक्स्ट वार्निंग का प्रचलन है, जो अप्रभावी साबित हो रहा है। याचिका में मांग की गई है कि तंबाकू की तर्ज पर शराब पर भी पिक्टोरियल वार्निंग अनिवार्य की जाए।

एसडीएम पर लगाया एक लाख का जुर्माना

एक अन्य मामले में राजस्थान हाई कोर्ट ने दौसा जिले के सिकराय पंचायत समिति क्षेत्र में पंचायत भवन निर्माण के लिए अवैध रूप से 150 से अधिक पेड़ काटने के मामले में सख्त रुख अपनाया है। कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश संजीव प्रकाश शर्मा और न्यायाधीश संगीता शर्मा की खंडपीठ ने तत्कालीन एसडीएम सहित दोषी अधिकारियों पर एक-एक लाख रुपए का जुर्माना लगाया। अदालत ने कहा कि पर्यावरण संरक्षण उतना ही महत्वपूर्ण है जितना सार्वजनिक निर्माण।

अनुमति से ज्यादा पेड़ कटाई का गंभीर मामला

याचिका में आरोप लगाया गया कि ग्राम पंचायत पाटन के भवन निर्माण के लिए तत्कालीन एसडीएम ने बिना सक्षम प्राधिकरण की मंजूरी के पेड़ काटने की अनुमति दे दी। अनुमति केवल 17 बड़े-मध्यम और 8 छोटे पेड़ों की थी, लेकिन प्रशासन ने 150 से अधिक पेड़ काट डाले। सरकार की ओर से दावा किया गया कि कटाई के बदले अलग भूमि पर 500 पौधे लगाए गए हैं। हालांकि, अदालत ने इसे अपर्याप्त माना और कहा कि अन्य स्थान पर पौधरोपण से अवैध कटाई को जायज नहीं ठहराया जा सकता।

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