Thursday, January, 29,2026

केंद्र सरकार में चयनित पीजी डॉक्टर्स को सेवा बॉन्ड से छूट

जयपुर: राजस्थान हाई कोर्ट ने चिकित्सा शिक्षा के क्षेत्र में एक अहम फैसला सुनाया है, जिसमें स्पष्ट किया गया है कि यदि कोई पीजी या सुपर स्पेशियलिटी डॉक्टर केंद्र सरकार या उसके अधीन संस्थान में चयनित होता है तो राज्य सरकार का सेवा बॉन्ड उन पर लागू नहीं होगा। कोर्ट ने ऐसे डॉक्टर्स को बॉन्ड शतों से छूट देने के साथ-साथ उनके मूल दस्तावेज तुरंत जारी करने के भी निर्देश दिए हैं।

यह फैसला जस्टिस अनुरूप सिंघी की एकलपीठ ने डॉ. प्रियंका पी. नायर और डॉ. कानाराम की याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए दिया। डॉ. प्रियंका (केरल निवासी) ने एसएमएस मेडिकल कॉलेज, जयपुर से पीजी की पढ़ाई पूरी की थी। राज्य नियमों के तहत उन्हें दो वर्ष का सेवा बॉन्ड भरना पड़ा। बाद में उनका चयन रेलवे बोर्ड (भारत सरकार) में हुआ और 12 अगस्त, 2022 को नियुक्ति पत्र जारी हुआ, लेकिन राज्य सरकार ने बॉन्ड पूरा करने और दस्तावेज रोके रखने की बात कही। इसी तरह डॉ. कानाराम का चयन केंद्र सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय में हुआ था। दोनों ने इसे नियमों के विरुद्ध बताते हुए हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी।

विभागीय आदेश और कोर्ट का आधार

सुनवाई में चिकित्सा शिक्षा विभाग के 1 दिसंबर, 2025 के आदेश का हवाला दिया गया, जिसमें कहा गया है कि यदि पीजी /सुपर स्पेशियलिटी डॉक्टर केंद्र या राज्य सरकार के स्वामित्व वाले संस्थान में नियुक्त होते हैं तो बॉन्ड शर्ते प्रभावी नहीं होंगी और उन्हें एनओसी एवं छूट मिलेगी। कोर्ट ने पहले के समान मामले (16 दिसंबर, 2025 का फैसला) का भी जिक्र किया। पीठ ने कहा कि याचिकाकर्ताओं का केंद्र सरकार में चयन निर्विवाद है, इसलिए उन्हें बॉन्ड से बाध्य नहीं किया जा सकता। राज्य सरकार को मूल दस्तावेज तुरंत जारी करने और जमा बैंक गारंटी / सुरक्षा राशि आवेदन पर 7 दिन में वापस करने के आदेश दिए गए।

हाई कोर्ट ने आरएएस-2023 विभागीय श्रेणी भर्ती के आरक्षित पदों की नियुक्ति प्रक्रिया पर लगाई रोक

राजस्थान हाई कोर्ट ने आरएएस-2023 भर्ती में विभागीय श्रेणी (इन-सर्विस कैंडिडेट्स) के लिए आरक्षित पदों पर नियुक्ति प्रक्रिया पर अंतरिम रोक लगा दी है। जस्टिस अशोक कुमार जैन की एकलपीठ ने यह आदेश रोहित कुमार सहित अन्य याचिकाकर्ताओं की याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान पारित किया। याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि विभागीय श्रेणी में 12.5 प्रतिशत आरक्षित पदों के लिए केवल जनरल कैटेगरी कट ऑफ जारी की गई, जबकि आरक्षित वर्ग (एससी/एसटी/ओबीसी आदि) के विभागीय अभ्यर्थियों के लिए अलग कट ऑफ होनी चाहिए। इससे संवैधानिक आरक्षण नियमों का उल्लंघन हो रहा है और सामान्य अभ्यर्थियों के अवसर प्रभावित हो रहे हैं। याचिकाकर्ताओं की पैरवी अधिवक्ता अक्षित गुप्ता, मोहित खंडेलवाल, प्रणव शर्मा, प्रज्ञा सेठ एवं श्रेयांश धारीवाल ने की। सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता ने समय मांगा और कहा कि भर्ती अंतिम चरण में है, रोक से पूरी प्रक्रिया प्रभावित होगी। पीठ ने कहा कि विभागीय आरक्षण की वैधता और लागू करने का तरीका महत्वपूर्ण कानूनी मुद्दा है। यदि नियुक्तियां हो गईं तो बाद में निरस्त करना जटिल होगा और विवाद बढ़ेगा। इसलिए अंतरिम रोक जरूरी है। कोर्ट ने सरकार को विस्तृत जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया। मामले की अगली सुनवाई 13 जनवरी को दोपहर 2 बजे होगी। तब तक विभागीय पदों पर नियुक्ति स्थगित रहेगी।

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