Thursday, January, 29,2026

झूठी एफआईआर की बाढ़... कार्रवाई 'ऊंट के मुंह में जीरा'

जयपुर: राजस्थान में हर दिन दर्ज हो रहे आपराधिक प्रकरणों की संख्या न्याय व्यवस्था के लिए एक बड़ी चुनौती बनती जा रही है। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि बड़ी संख्या में मामले जांच के दौरान झूठे या तथ्यहीन साबित हो रहे हैं, इसके बावजूद ऐसे प्रकरण दर्ज कराने वालों पर कार्रवाई न के बराबर है। इसका सीधा असर पुलिस, अदालतों और वास्तविक पीड़ितों पर पड़ रहा है, जिन्हें समय पर न्याय नहीं मिल पा रहा। विधानसभा में प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार 1 जनवरी 2024 से 30 जून 2025 के बीच राज्य में हत्या, बलात्कार, लूट, आत्महत्या के लिए उकसाने जैसे गंभीर अपराधों के 14,500 से अधिक मामले दर्ज किए गए। इनमें से लगभग 6,700 मामलों में चालान पेश किया जा चुका है, जबकि सैकड़ों मामले अभी भी जांच के दायरे में हैं। इसके अलावा, बड़ी संख्या में ऐसे प्रकरण सामने आए हैं जिनमें आरोप प्रमाणित नहीं हो सके और पुलिस को एफआर लगानी पड़ी।

केस 01

जयपुर ग्रामीण के कालाडेरा थाना क्षेत्र में जमीन विवाद के चलते एक महिला से छेड़छाड़ और वस्त्र फाड़ने का आरोप लगाया गया। शुरुआती कार्रवाई में आरोपी पक्ष को जेल जाना पड़ा, लेकिन बाद में पुलिस जांच में आरोप झूठे पाए गए।

केस 02

जयपुर ईस्ट के गांधीनगर थाना क्षेत्र में मारपीट के एक मामले में बचाव के लिए जातिसूचक शब्दों के प्रयोग की क्रॉस एफआईआर दर्ज करवाई गई, जो जांच में असत्य साबित हुई।

कानून के दुरुपयोग को मिल रहा बढ़ावा

सबसे गंभीर सवाल यह है कि हजारों मामलों में झूठ सामने आने के बावजूद, झूठे मामले दर्ज कराने वालों पर कार्रवाई बेहद सीमित रही। आंकड़ों के मुताबिक इस अवधि में केवल 134 मामलों में ही धारा 182 और 211 (अब बीएनएस की समकक्ष धाराएं) के तहत कार्रवाई की गई। कानून विशेषज्ञों का कहना है कि जब झूठे मामले दर्ज कराने वालों को दंडित नहीं किया जाता, तो इससे कानून के दुरुपयोग को बढ़ावा मिलता है और निर्दोष लोगों को अनावश्यक रूप से जांच व मुकदमे की पीडा झेलनी पड़ती है।

जांच में उजागर हो रही सच्चाई

सरकारी आंकड़े यह भी दशति हैं कि बलात्कार, गैंगरेप और हत्या जैसे संवेदनशील अपराधों में भी 10 से 35 प्रतिशत तक मामले ऐसे रहे, जिनमें जांच के दौरान आरोप टिक नहीं पाए। वर्ष 2023 से 2025 के बीच इन श्रेणियों में दर्ज करीब 8,000 मामलों में से लगभग 2,800 मामलों में एफआर लगाई गई।

पुलिस और अदालतों पर बढ़ता बोझ

झूठे प्रकरणों का सीधा असर पुलिस और न्यायालयों की कार्यक्षमता पर पड़ रहा है। जांच अधिकारी अपना समय और संसाधन ऐसे मामलों में खर्च करने को मजबूर है, जिससे वास्तविक पीड़ितों के मामलों में देरी हो रही है। अदालतों में लंबित मामलों की संख्या बढ़ने से न्याय प्रक्रिया की गति भी प्रभावित हो रही है।

 

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