Thursday, January, 29,2026

दोषसिद्धि से पहले जमानत नागरिक का अधिकारः चंद्रचूड़

जयपुर: देश के पूर्व प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) डी.वाई. चंद्रचूड़ ने स्पष्ट रूप से कहा है कि दोषसिद्धि से पहले जमानत प्राप्त करना नागरिक का संवैधानिक अधिकार है, न कि कोई रियायत। उन्होंने चेतावनी दी कि जमानत को अपवाद बनाने की प्रवृत्ति नागरिक स्वतंत्रता और न्याय के मूल सिद्धांतों को कमजोर करती है। जयपुर साहित्य महोत्सव के 19वें संस्करण में रविवार को आयोजित 'Ideas of Justice' सत्र में वरिष्ठ पत्रकार वीर सांघवी से संवाद के दौरान न्यायाधीश (सेवानिवृत्त) चंद्रचूड़ ने जमानत, राष्ट्रीय सुरक्षा कानूनों, न्यायिक प्रक्रिया में देरी और न्यायपालिका में पारदर्शिता जैसे मुद्दों पर बेबाक राय रखी। सत्र की शुरुआत छात्र नेता उमर खालिद की जमानत याचिका खारिज होने से जुड़े सवाल से हुई।

इस पर प्रतिक्रिया देते हुए उन्होंने कहा कि भारतीय आपराधिक कानून की बुनियाद इस धारणा पर टिकी है कि जब तक दोष सिद्ध न हो, आरोपी निदर्दोष माना जाता है। उन्होंने कहा, 'यदि आरोपी के फरार होने, सबूतों से छेड़छाड़ करने या समाज के लिए खतरा बनने की आशंका नहीं है, तो जमानत से इनकार नहीं किया जा सकता।' राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों पर पूर्व सीजेआई ने कहा कि ऐसे कानूनों के दुरुपयोग की आशंका बनी रहती है और अदालतों का दायित्व है कि वे यह सुनिश्चित करें कि राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला वास्तविक हो। उन्होंने चेताया कि अन्यथा लोग वर्षों तक जेल में बंद रहते हैं और मुकदमे के अंत में न्याय का कोई अर्थ नहीं रह जाता। पूर्व सीजेआई ने कहा कि जमानत को नियम और जेल को अपवाद बनाना ही लोकतंत्र और संवैधानिक न्याय की पहचान है।

निचली अदालतों में जमानत पर डर

न्यायाधीश चंद्रचूड़ ने न्यायिक प्रक्रिया में देरी को गंभीर समस्या बताते हुए कहा कि संविधान का अनुच्छेद 21 त्वरित सुनवाई की गारंटी देता है। यदि मुकदमा समय पर पूरा नहीं हो पा रहा है, तो आरोपी जमानत का अधिकारी है। उनके कार्यकाल में सुप्रीम कोर्ट ने हजारों मामलों में जमानत देकर नागरिक स्वतंत्रता की रक्षा की। निचली अदालतों द्वारा जमानत देने में हिचकिचाहट पर उन्होंने चिंता जताई और कहा कि न्यायाधीशों में यह डर बढ़ा है कि कहीं उनकी निष्ठा पर सवाल न उठ जाए। इसी कारण बड़ी संख्या में जमानत याचिकाएं उच्च न्यायालयों और सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच रही हैं।

कॉलेजियम में पारदर्शिता की वकालत

न्यायाधीशों की नियुक्ति की कॉलेजियम व्यवस्था पर बोलते हुए उन्होंने पारदर्शिता की जरूरत पर जोर दिया और सुझाव दिया कि प्रक्रिया में नागरिक संस्थाओं से विशिष्ट व्यक्तियों को शामिल किया जाना चाहिए, ताकि न्यायपालिका में जनता का भरोसा और मजबूत हो।

वैवाहिक बलात्कार अपराध घोषित हो

वैवाहिक बलात्कार को अब तक अपराथ न बनाए जाने पर उन्होंने निराशा जताते हुए कानून में बदलाव की वकालत की। अपने कार्यकाल के अहम फैसलों का जिक्र करते हुए उन्होंने सशस्त्र सेनाओं में महिलाओं को स्थायी कमीशन, समलैंगिकता को अपराध के दायरे से बाहर करने और चुनावी बॉन्ड पर आए फैसलों को ऐतिहासिक बताया।

 

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