Friday, September, 25,2026

अब हर जांच पर डिजिटल शिकंजा, क्लेम में 47 प्रतिशत की आई कमी

जयपुर: RGHS में अब हर जांच का डिजिटल हिसाब-किताब हो रहा है। 15 जुलाई से 2,000 से ज्यादा की जांचों पर प्री-ऑथराइजेशन अनिवार्य किए जाने के बाद क्लेम में 47% की कमी दर्ज की गई है। मॉनिटरिंग में यह भी सामने आया कि प्री-ऑथराइजेशन से बचने के लिए कुछ जगह एक साथ लिखी जाने वाली जांचें अलग-अलग दिनों में कराई गई और मरीजों को बार-बार अस्पताल बुलाया गया। इसी डिजिटल निगरानी में प्रिस्क्रिप्शन और सिग्नेचर में गड़बड़ी जैसे मामले भी पकड़े गए हैं।

डॉक्टर एक, लिखावट दो... सिग्नेचर भी अलग

अलवर के एक अस्पताल में डॉक्टर के नाम से जारी प्रिस्क्रिप्शन में अलग-अलग हैंडराइटिंग और सिग्नेचर मिले। दूसरे अस्पताल के कई ओपीडी प्रिस्क्रिप्शन में डॉक्टर की सील और सिग्नेचर का एक जैसा पैटर्न पाया गया। जोधपुर में भी एक चिकित्सक के नाम से दो अलग-अलग हैंडराइटिंग और दो अलग सिग्नेचर पैटर्न सामने आए। इन मामलों में दस्तावेजों की जांच के आधार पर कार्रवाई की गई।

9 अस्पतालों पर गाज, 3 डॉक्टरों की ID ब्लॉक

मॉनिटरिंग और जांच के बाद 9 अस्पतालों का TMS और 3 डॉक्टरों की डॉक्टर ID ब्लॉक की गई है। कोटा के दो अस्पतालों में एक ही चिकित्सक के एक ही दिन दोनों जगह काम करने का मामला सामने आया। दोनों अस्पतालों का TMS ब्लॉक किया गया और संबंधित डॉक्टर की ID भी ब्लॉक कर दी गई। बीकानेर से जुड़े चिकित्सक की ID भी ब्लॉक की गई। अलग-अलग मरीजों की शिकायतों के बावजूद बार-बार समान जांचें लिखे जाने का मामला सामने आया। जयपुर के एक अस्पताल से जुड़े डॉक्टर की आईडी अलग-अलग हैंडराइटिंग पाए जाने के कारण ब्लॉक की गई। उदयपुर के एक अस्पताल का TMS भी विभिन्न मामलों के चलते ब्लॉक किया गया। अलवर के एक अस्पताल में 65 मामलों में पॉलीइथिलीन ग्लाइकोल लिखे जाने की बात मॉनिटरिंग में सामने आई। इनमें कई मामलों में संबंधित क्लिनिकल इंडिकेशन दर्ज नहीं था। कई मरीजों में सीरम आयरन जांच भी बिना स्पष्ट लक्षण, क्लिनिकल फाइंडिंग या डायग्नोसिस के लिखी गई। दौसा के एक अस्पताल में पर्याप्त क्लिनिकल फाइंडिंग और जस्टिफिकेशन के बिना जांचें लिखने तथा जरूरत से ज्यादा जांचों की सलाह देने का मामला सामने आया।

₹2 हजार की सीमा से बचने का खेल

आरजीएचएस की प्रोजेक्ट अधिकारी डॉ. निधि पटेल के अनुसार कुछ मामलों में ₹2,000 से ज्यादा की जांचों को प्री-ऑथराइजेशन के दायरे से बाहर रखने के लिए जांचें अलग-अलग तारीखों में लिखी गई। कुछ मरीजों को तीन दिन के भीतर अलग-अलग जांचों के लिए बार-बार अस्पताल बुलाया गया। यानी जिस प्रक्रिया का मकसद मरीजों को अनावश्यक जांच और खर्च से बचाना है, उससे बचने के लिए ही जांचों को अलग-अलग दिनों में कराने का पैटर्न सामने आया। डिजिटल सिस्टम ऐसे मामलों में जांच की तारीख, प्रिस्क्रिप्शन और क्लेम पैटर्न को ट्रैक कर रहा है।

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